जासं, लुधियाना : देशी की राजनीति में परिवारवाद का चलन शुरूआती दौर से है, हालांकि कुछ राजनीतिक दल अब इससे पीछा छुड़ाने की कसरत कर रहे हैं, लेकिन परिवारवाद अब वार्ड स्तर की राजनीतिक में भी अपनी पकड़ मजबूत कर चुका है। लुधियाना नगर निगम चुनाव में इसकी मिसाल देखी जा रही है। नेता राजनीति करने की बजाए अपनी पत्नियों की जीत के लिए सर्दी में भी पसीना बहा रहे हैं। इसे लेकर सोशल मीडिया पर भी कटाक्ष किए जा रहे हैं। लोगों का मानना है कि स्वच्छ, पारदर्शी राजनीति के लिए परिवारवाद को कड़ाई के साथ खत्म करना होगा। निगम में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए पचास फीसदी सीटें आरक्षित कर दी गई। लेकिन इसमें आम महिलाओं की जगह नेताओं के परिवारों से जुड़ी महिलाओं ने मोर्चा संभाल लिया। हाल यह है कि नेता अपने परिवार की महिलाओं को टिकट दिलाने में कामयाब रहे। अब पार्टी लाइन को दरकिनार कर उसकी जीत के लिए जुटे हैं। जबकि सालों से पार्टी के लिए काम करने वाली महिलाएं टिकट से वंचित रह गईं। इतना ही नहीं, कुछ नेताओं ने पार्टी के ही उम्मीदवार के खिलाफ अपने परिवार की महिला प्रत्याशी को आजाद उम्मीदवार के रूप में खड़ा कर दिया। इसी के चलते शिरोमणि अकाली दल ने अपनी पार्टी के छह सदस्यों को कुछ दिन पहले बाहर का रास्ता दिखा दिया। जबकि इसी बात से नाराज होकर कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने पिछले दिनों सांसद रवनीत सिंह बिट्टू के निवास के समक्ष प्रदर्शन भी किया था। स्वयं सेवी संगठन लुधियाना केयर की सदस्य हरप्रीत सोइन का कहना है कि 50 फीसदी आरक्षण महिला सशक्तीकरण के लिए दिया गया। लेकिन राजनीति में चल रहा है उससे किसी तरह का महिला सशक्तीकरण होने वाला नहीं है। उनका कहना है कि जो वर्तमान हालात हैं, उसमें तो जिस नेता की सीट महिला रिजर्व हो गई वह अपने परिवार की महिला को चुनाव में उतार देता है। उनका कहना है कि महिलाओं को सशक्त होना है तो उन्हें खुद काम करना पड़ेगा और अपने किसी भी काम के लिए किसी अन्य पर आश्रित नहीं होना चाहिए। उधर, फेडरेशन ऑफ पंजाब स्माल इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के प्रेसीडेंट बदीश जिंदल का कहना है कि निगम में पचास फ सदी सीटें महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के लिए आरक्षित की गई थी। लेकिन नेताओं के परिवार के सदस्यों को टिकट देकर लोकतंत्र के साथ कोरा मजाक किया गया है। इससे सशक्तिकरण का मकसद पूरा नहीं हो पाएगा। इससे वर्कर की प्रतिष्ठा भी धूमिल हुई है। वर्कर वर्षो तक इलाके में पार्टी की नीतियों को घर घर पहुंचाता है, लेकिन जब टिकट की बारी आती है तो परिवार हावी हो जाता है। साफ है कि पार्टियों को वर्कर की नहीं, नेताओं की चिंता है। निगम में पार्षद पति सिस्टम खतरनाक है, इससे शहर के विकास की रफ्तार पर विपरीत असर हो सकता है।

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