जासं, लुधियाना। जिले के किसी भी नेशनल हाईवे या स्टेट हाईवे पर होने वाली सड़क दुर्घटनाओं के घायलों की जान का भगवान ही मालिक है। सड़क हादसों में गंभीर रूप से घायलों को तुरंत अस्पताल पहुंचाया जाए इसके लिए न तो एंबुलेंस की व्यवस्था है और न नेशनल हाईवे के आसपास सुविधा संपन्न कोई ट्रामा सेंटर है। खून से सनी सड़कों पर जिंदगियां दम तोड़ रही हैं। खन्ना सिविल अस्पताल में कहने के लिए तो ट्रामा सेंटर है लेकिन वहां पर्याप्त स्टाफ और उपकरण ही नहीं हैं।

करीब दस वर्ष पहले पंजाब पुलिस ने लोगों के सहयोग से हाईवे पर एंबुलेंस लगाने का प्रयास किया था। प्रत्येक हर शहर के प्रवेश द्वार पर एंबुलेंस को पार्क करने के लिए बाकायदा शेड बनाकर दिए थे। यह एंबुलेंस पुलिस कंट्रोल रूम के आदेश पर चलती थीं। पुलिस कंट्रोल रूम में कहीं पर भी सड़क हादसे के संबंध में काल आने पर इन एंबुलेंस को तुरंत घटनास्थल पर भेज दिया जाता था। यह योजना कुछ समय के बाद ही दम तोड़ गई।

दैनिक जागरण की ओर से जिले में किए गए 376 किलोमीटर सड़कों के सर्वे में कहीं भी सड़क हादसों के घायलों के लिए एक भी एंबुलेंस नहीं थी। लुधियाना जिले से होकर नेशनल हाईवे-5 (खरड़, मोरिंडा, लुधियाना, मोगा, फिरोजपुर) और नेशनल हाईवे-44 (पठानकोट, जालंधर, लुधियाना, राजपुरा) मुख्य रूप से गुजरते हैं। नेशनल हाईवे पर एंबुलेंस और ट्रामा सेंटर की सबसे अधिक जरूरत रहती है, चूंकि नेशनल हाईवे पर वाहन तेज रफ्तार में होते हैं और हादसे भी अधिक होते हैं। इन दोनों नेशनल हाईवे पर लुधियाना जिले में चार स्थानों पर टोल प्लाजा जरूर हैं लेकिन एंबुलेंस तक की व्यवस्था नहीं है।

पांच जगह टोल प्लाजा, कहीं भी एंबुलेंस नहीं :

नेशनल हाईवे अथारिटी आफ इंडिया के नियमों के अनुसार टोल कलेक्शन सेंटरों पर एंबुलेंस और रिकवरी वैन होनी चाहिए। वहां कोई सड़क दुर्घटना होने पर एंबुलेंस से तुरंत घायलों को अस्पताल पहुंचा जा सके और रिकवरी वैन से वाहनों को हटाया जा सके। लुधियाना जिले में पांच टोल प्लाजा हैं। एक पर भी 24 घंटे एंबुलेंस की व्यवस्था नहीं है। दुर्घटना होने पर 108 एंबुलेंस का सहयोग लिया जाता है। यह एंबुलेंस प्राइमरी हेल्थ सेंटरों में होती है, लेकिन इसकी सीमा भी 35 किलोमीटर तक जाने की है।

1. लाडोवाल टोल प्लाजा (एनएच)

2. लाडोवाल बाईपास टोल प्लाजा (एनएच)

3. समराला-चंडीगढ़ रोड पर घुलाल टोल प्लाजा (एनएच)

4. लुधियाना-फिरोजपुर रोड पर चौकीमान टोल प्लाजा (एनएच)

5. हस्सोवाल टोल प्लाजा रायकोट रोड पर (स्टेट हाईवे)

सरकारी अस्पतालों का तो और भी हाल खराब...

जिले के सरकारी अस्पतालों का हाल तो और भी खराब है। ट्रामा सेंटर न होने पर सड़क हादसों के घायलों को सरकारी अस्पताल ले जाने पर उनका दर्द और बढ़ जाता है। सरकारी प्राइमरी हेल्थ सेंटरों और सब डिवीजनल अस्पतालों में जरूरत के हिसाब से डाक्टर और उपकरण नहीं हैं। वहां से घायलों को रेफर करने का सिलसिला शुरू होता है और सिविल अस्पताल और मेडिकल कालेज तक चलता है। इतने में गंभीर रूप से घायल की जान सांसत में फंसी रहती है।

लोगों में संवेदना... जिम्मेदारों में क्यों नहीं

1- कुछ दिन पहले ही चंडीगढ़ रोड पर दो कारों में जोरदार टक्कर हो गई थी। इस हादसे में तीन लोगों की मौत हो गई थी और छह लोग गंभीर रूप से घायल हो गए थे। घायलों को एक स्थानीय गायक अपने निजी वाहन से पहले समराला के सिविल अस्पताल पहुंचाया था। घायलों को उसके बाद सिविल अस्पताल लुधियाना और फिर पटियाला के राजिंदरा अस्पताल रेफर करना पड़ा था। गायक की मदद से उन घायलों की जान बच गई।

2- बीती 15 नवंबर की रात को माछीवाड़ा-कोहाड़ा रोड पर एक तेज रफ्तार ट्रक चालक ने युवकों की बाइक को चपेट में ले लिया था। हादसे में दो युवकों की मौत हो गई थी जबकि दो गंभीर रूप से घायल हो गए थे। इस हादसे के बाद भी पास की फैक्ट्री में काम करने वाले गुरदीप सिंह घायल युवकों को अपने वाहन से अस्पताल लेकर आए थे।

खन्ना स्थित ट्रामा सेंटर, जहां व्यवस्थाओं के नाम पर खानापूर्ति की गई है।

खन्ना में ट्रामा सेंटर के नाम पर खानापूर्ति :

राज्य सरकार ने सिविल अस्पताल में एक ट्रामा सेंटर बनाया है। यह भी रेफर करने वाला सेंटर बन गया है। डाक्टरों, टेक्निशियन और जरूरी उपकरणों की कमी से जूझ रहे इस सेंटर में प्राथमिक उपचार देकर लुधियाना सिविल अस्पताल रेफर कर दिया जाता है।

तीसरी श्रेणी के इस ट्रामा सेंटर को वर्ष 2013 में बनाया गया था। कोरोना काल में जरूरत पड़ने पर यहां पांच वेंटीलेटर लगाए गए। अब भी इस सेंटर में आपरेशन थियेटर के छह असिस्टेंट की जरूरत है। न्यूरो सर्जन व प्लास्टिक सर्जन नहीं है। नर्सिंग स्टाफ से लेकर दर्जा चार कर्मचारियों की कमी है। उपकरण भी बहुत कम हैं।

Edited By: Pankaj Dwivedi

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