लुधियाना, [राजेश भट्ट]। लुधियाना में एक बरगद का पेड़ है जो कि आज भी अंग्रेजों के जबर जुल्म का गवाह है। इस बरगद के पेड़ ने कई देशभक्तों की फांसी को देखा है और इस पेड़ के नीचे कई लोगों को अंग्रेज यातनाएं दिया करते थे। यह वही बरगद का पेड़ है जो स्वतंत्रा के कूका आंदोलन का स्मारक भी है। इसी बरगद के पेड़ पर नामधारी समुदाय के सूबा रत्न सिंह व संत रत्न सिंह को अंग्रेजों ने फांसी दी थी। अब इस बरगद के पेड़ को नामधारी ही नहीं बल्कि पूरे देश के लोग स्वतंत्रता आंदोलन के स्मारक के रूप में देखते हैं।

सतगुरु राम सिंह ने जब स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजों का विरोध किया तो उनके कई सहयोगियों और अनुयायियों को अपने प्राण भी न्यौछावर कर दिए। रायकोट में बने बूचड़खाने को बंद करवाने के लिए तब लोगों ने बूचड़खाने पर हमला कर लिया था। 1871 में बूचड़खाने पर हमले के आरोप में कूका पलटन के सूबा ज्ञानी रत्न सिंह व संत रतन सिंह को आरोपित मानते हुए इस बरगद के पेड़ पर फांसी दी गई थी।

वर्तमान में जहां जिले का सिविल अस्पताल है, उसके साथ अंग्रेजों ने जेल बनाई थी। ज्ञानी रत्न सिंह व संत रत्न सिंह को भी इसी जेल में रखा गया था और जहां बरगद का पेड़ है। वहां पर जेल की ढ्योढी हुआ करती थी। यहीं पर कैदियों के रिश्तेदार उनसे मुलाकात करने आया करते थे। अंग्रेज जेलर जब उस वक्त किसी को सजा देते थे तो इसी स्थान पर लाकर सजा देते थे ताकि लोग भी देख सकें। 23 नवंबर 1871 को इन दोनों योद्धाओं को यहां पर फांसी दी गई थी। इसीलिए अंग्रेजों ने सूबा ज्ञानी रत्न सिंह व संत रत्न सिंह को इस बरगद के पेड़ पर फांसी दी गई। अब यहां पर नामधारी शहीद मेमोरियल ट्रस्ट ने नामधारी स्मारक बना लिया है।

ज्ञानी रत्न सिंह और संत रतन सिंह की इस तरह हुई शहादत 

मंगल पांडे ने मेरठ में अंग्रेजों से बगावत कर स्वतंत्रता संग्राम का बिगुल बजाया तो इधर पंजाब में सतगुरु राम सिंह ने पंजाब में अंग्रेजों के खिलाफ बगावत शुरू कर दी। अंग्रेजों को इन दोनों बगावतों से लगा कि अब भारत से उनकी सत्ता जा सकती है। सतगुरु राम सिंह ने बैसाखी के दिन श्वेत पताका फैलाकर अंग्रेजों के खिलाफ कूका आंदोलन की शुरुआत की। सतगुरु राम सिंह के साथ उनके सहयोगी ज्ञानी रत्न सिंह और संत रत्न सिंह भी इस बगावत में शामिल हुए और अंग्रेजों के खिलाफत पर उतर आए। आंदोलन के दौरान रायकोट में एक बूचड़खाने का लोगों ने विरोध करना शुरू किया तो 18 जुलाई 1871 को रात आठ बजे बूचड़खाने पर हमला हुआ और उसमें गायों को रिहाकर दिया गया जबकि बूचड़खाने के मालिक की हत्या कर दी गई।

बूचड़खाने पर हमले से भयभीत हो गई थे अंग्रेज

रायकोट में बूचड़खाना अंग्रेजों ने शुरू करवाया था और जब नामधारियों व लोगों ने मिलकर इसे तोड़ दिया तो अंग्रेज इससे भयभीत हो गए और उन्होंने हमला करने वालों को पकड़ने के लिए छापेमारी शुरू कर दी। सात दिन तक अंग्रेजों के हाथ कुछ नहीं लगा, लेकिन सातवें दिन उन्होंने कुछ नामधारियों को पकड़ लिया। जिनमें से तीन को फांसी की सजा तय की गई। तीन नामधारियों काे रायकोट में सार्वजनिक स्थल पर फांसी दी गई, जबकि ज्ञानी रत्न सिंह व संत रत्न सिंह को लुधियाना जेल में लाया गया। 26 अक्तूबर 1871 को इन्हें फांसी की सजा सुनाई गई लेकिन 11 नवंबर 1871 को दोनों की सजा को कालापानी की सजा में बदल दिया गया। फिर 14 नवंबर को जज ने दोबारा देानों को फांसी की सजा सुनाई और 23 नवंबर 1871 को इस बरगद के पेड़ पर लटका कर उन्हें फांसी दे दी गई। 

सतगुरु नाम सिंह ने किया था अंग्रेजी अदालतों का विरोध

सतगुरु राम सिंह ने सबसे पहले अंग्रेजों की अदालतों का विरोध और खुद अपनी अदालतें स्थापित कर समाज के पढ़े लिखे व सूझवान लोगों को अदालत चलाने को कहा। ज्ञानी रत्न सिंह भी उस वक्त अदालत चलाया करते थे और लोगों के विवादों को सुलझाया करते थे।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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