लुधियाना, [राधिका कपूर]। शहर के जालंधर बाईपास स्थित महाराजा रंजीत सिंह वार म्यूजियम एक ऐसी जगह है जो पुरानी धरोहर को अच्छे से संजोए हुए है। प्रथम विश्व युद्ध की बात करें या फिर द्वितीय विश्व युद्ध की, उस समय हुए युद्ध में किस तरह के टैंकर और जहाज का इस्तेमाल हुआ है। इन्हीं चीजों को समेटते हुए पुरानी धरोहर पंजाब के महान योद्धा महाराजा रंजीत सिंह के नाम से बने म्यूजियम में देखने को मिल जाएगी। 

यहां देखने को मिलेंगे टैंकर व हथियार

वार म्यूजियम में इस समय महाराजा रंजीत सिंह के समय में प्रयोग होने वाले एंटीक हथियार, जिसमें तलवारें, चाकू, प्रथम विश्व युद्ध, दूसरे विश्व युद्ध, आजादी से पहले और आजादी के बाद होने वाली लड़ाइयों में प्रयोग होने वाले हथियार, टैंकर को सजाया गया है। इस दौरान म्यूजियम में बने पार्क में तेरह आइटम्स प्रदर्शित किए गए हैं, जिसमें दो जहाज हैं और ग्यारह छोटे और बड़े टैंक शामिल हैं। म्यूजियम के मुख्य द्वार पर महाराजा रंजीत सिंह का बुत लगा हुआ है।

बुत और तस्वीरें बताएंगी इतिहास की हर बात

वहीं अंदर के एक हॉल में बंदा बहादुर, हरि सिंह नलूआ के भी बुत बने हुए हैं। म्यूजियम के दूसरे हॉल में एयर चीफ मार्शल दिलबाग सिंह, जनरल वीएन शर्मा, एडमिरल एसएम नंदा, एयर चीफ मार्शल अर्जुन सिंह, फील्ड मार्शल सैममानेक शा इत्यादि की भी तस्वीरें लगी हुई हैं, जिन्होंने सेना में विशेष रूप से कार्य किए हैं। म्यूजियम प्रांगण में कारगिल दी जंग की भी एक तस्वीर लगी हुई है। म्यूजियम में युवा, परिवार इतिहास से जुड़ी पुरानी यादों को देखने के लिए आते हैं।

पुराने टैंक और जहाज का इतिहा

महाराजा रंजीत सिंह वार म्यूजियम में ऐसे कई पुराने टैंकर हैं, जिनका नाम केवल किताबों में ही पढ़ने को मिला है। वह क्यों प्रसिद्ध हैं, इससे बहुत से लोग अंजान हैं। टी-54 टैंक ने वर्ष 1966 से 1993 तक भारतीय फौज में सेवा की। वर्ष 1971 में भारत-पाक युद्ध में भी इस टैंक ने अपनी ताकत दिखाई थी। पीटी-76 टैंक रशिया की तरफ से वर्ष 1954 में तैयार किया गया। वर्ष 1971 में बांग्लादेश के खिलाफ 45 कवैलरी और 69 आम्र्ड रेजिमेंट के साथ लड़ाई लड़ने का मौका मिला था। फोर्ड टी-16 एमके वन टैंक अमेरिका की ओर से 1946 में तैयार कर भारतीय सेना को सौंपा गया था। 1971 की जंग के दौरान ऑप्रेशन कैकटस लिली के लिए इस टैंक ने विशेष योगदान दिया था। सुखोई एसयू-7 एक सीटर विमान है और इसे 1968 की जंग में वायुसेना में शामिल किया गया। वहीं मिग-27 को 1980 में भारतीय वायुसेना में शामिल किया गया व कारगिल युद्ध और पराक्रम ऑप्रेशन में इस विमान का इस्तेमाल हुआ था।

यहां जंग की निशानियां सुना रही है शौर्य की गाथा

छह एकड़ में बने म्यूजियम में महान योद्धाओं की तस्वीरें लगी हैं। शहीदों और विशेष रूप से सेवाएं देने वालों के चित्र भी यहां सुशोभित हैं। गवर्नर जनरल ओपी मल्होत्रा ने 11 मई, 1991 को म्यूजियम का नींव पत्थर रखा था। सितंबर, 2005 में मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने वार म्यूजियम का उद्घाटन किया था।

40 रुपये में दो घंटे तक कीजिए म्यूजियम का दीदार

म्यूजियम इंचार्ज सूबेदार मेजर धर्मपाल ने बताया कि वार म्यूजियम में एंटीक हथियार सहित आजादी से पहले और बाद में होने वाले युद्ध के सामान को संजोया हुआ है। पुरानी धरोहर को देखने के लिए लोग दूर-दराज से भी आते हैं। पूरा सप्ताह यह म्यूजियम सुबह दस बजे से शाम पांच बजे तक खुला रहता है। 40 रुपये में दो घंटे तक इस म्यूजियम में जानकारी ली जा सकती है, वहीं बच्चों के लिए यह फीस दस रुपये है।

 

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