एक परिवार के कठिन दौर से दूसरे की दुनिया रोशन... 15 मिनट में पूरा होता है नेत्रदान; कैसे काम करता है आई बैंक?
नेत्रदान किसी दृष्टिहीन व्यक्ति के जीवन में रोशनी ला सकता है, जिसमें मृत्यु के छह घंटे के भीतर कॉर्निया प्राप्त ...और पढ़ें

15 मिनट की डॉक्टरी प्रक्रिया से पूरा होता है नेत्रदान। फोटो जागरण
HighLights
मृत्यु के छह घंटे के भीतर नेत्रदान से कॉर्निया प्राप्त करें।
डॉ. रमेश मंसूरा ने पुनर्जोत आई बैंक की सफलता बताई।
नेत्रदान प्रक्रिया में परिवार की सहमति और समन्वय महत्वपूर्ण है।
आशा मेहता, लुधियाना। किसी व्यक्ति की मृत्यु के साथ एक परिवार के लिए जिंदगी का सबसे कठिन दौर शुरू होता है, लेकिन यही समय किसी दूसरे दृष्टिहीन व्यक्ति की दुनिया रोशन करने का अवसर भी बन सकता है। नेत्रदान में मृत्यु की सूचना मिलने के बाद हर मिनट महत्वपूर्ण होता है।
अस्पताल प्रशासन, नर्सिंग स्टाफ, नेत्रदान समन्वयक, मृतक का परिवार और आई बैंक की टीम के बीच समयबद्ध समन्वय ही इस प्रक्रिया को सफल बनाता है।
प्रसिद्ध नेत्र विशेषज्ञ तथा डॉ. रमेश सुपरस्पेशलिटी आई एंड लेजर सेंटर एवं पुनर्जोत आई बैंक सोसायटी के मेडिकल डायरेक्टर डॉ. रमेश मंसूरा बताते हैं कि मौत के करीब छह घंटे के भीतर आंखें प्राप्त कर कॉर्निया को सुरक्षित करना जरूरी होता है।
जितनी जल्दी कॉर्निया सुरक्षित कर लिया जाए, उसकी गुणवत्ता बनाए रखने की संभावना उतनी बेहतर होती है।
आई बैंक तक पहुंचाता है शव आने की सूचना
अस्पताल में किसी मरीज की मृत्यु होने पर, यदि वहां नेत्रदान को लेकर समन्वय की व्यवस्था है तो संबंधित स्टाफ आई बैंक या नेत्रदान समन्वयक को सूचना देता है। कई मामलों में मोर्चरी स्टाफ भी दुर्घटना, सामान्य मृत्यु या अन्य परिस्थितियों में शव आने की सूचना आई बैंक तक पहुंचाता है।
सूचना मिलने के बाद परिवार से बात करने का सबसे संवेदनशील चरण शुरू होता है। शोक में डूबे परिवार को नेत्रदान के महत्व और पूरी प्रक्रिया के बारे में संवेदनशील तरीके से समझाया जाता है।
परिवार की सहमति मिलने पर आवश्यक दस्तावेजों की जांच और सहमति पत्र की प्रक्रिया पूरी की जाती है। इसके बाद आई बैंक की प्रशिक्षित टीम मौके पर पहुंचती है।
अंतिम दर्शन के दौरान की जाती है कृत्रिम व्यवस्था
चिकित्सकीय प्रक्रिया में करीब 15 मिनट लगते हैं। मृतक की स्थिति और उम्र के अनुसार आंखों से आईबॉल या मुख्य रूप से कार्निया प्राप्त किया जाता है। साथ ही मृतक के ब्लड सैंपल भी लिए जाते हैं। प्रक्रिया के बाद मृतक के चेहरे की सामान्य आकृति को बनाए रखने के लिए कृत्रिम व्यवस्था की जाती है, जिससे अंतिम दर्शन के दौरान परिजनों को किसी तरह की असहजता न हो।
आई बैंक पहुंचने के बाद वास्तविक चिकित्सकीय जांच का अगला चरण शुरू होता है। आंख से कार्निया को अलग कर उसकी पारदर्शिता, सेल काउंट और गुणवत्ता की जांच की जाती है।
रक्त नमूनों की जांच के माध्यम से एचआइवी, हेपेटाइटिस और अन्य गंभीर संक्रमणों जैसी स्थितियों को देखा जाता है। उपयुक्त पाए जाने वाले कार्निया को विशेष प्रिजर्वेशन मीडिया में सुरक्षित रखा जाता है। इसके बाद यह तय होता है कि कार्निया किस मरीज के लिए उपयुक्त होगा।
मरीज को नियमित फॉलोअप के लिए बुलाया जाता है
प्रत्यारोपण से पहले मरीज की आंख की स्थिति और उसे आवश्यक कार्निया के प्रकार का चिकित्सकीय मूल्यांकन किया जाता है। इसी आधार पर उपलब्ध कार्निया का चयन कर प्रत्यारोपण किया जाता है और मरीज को बाद में नियमित फालोअप के लिए बुलाया जाता है।
डा. रमेश मंसूरा बताते हैं कि वर्ष 2008 में स्थापित पुनर्जोत आई बैंक के माध्यम से अब तक करीब सात हजार कार्निया प्रत्यारोपण किए जा चुके हैं।
