लुधियाना [आशा मेहता]। करीब दो दशक पहले तक गोरैया शहरों और गांवों में आम नजर आती थी। घर के आंगन में गोरैया के चहकने की आवाज सुनाई देती थी। अब यह नन्हीं गोरैया कहीं गुम सी हो गई हैं। घरों को अपनी चीं-चीं से चहकाने वाली गोरैया अब आम नहीं दिखाई देती। पंजाब कृृषि विश्वविद्यालय के डिपार्टमेंट ऑफ जूलॉजी के वैज्ञानिकों ने गोरैया के बसेरे को ढूंढा है। उनके अनुसार गोरैया ने शहरों में रहन-सहन और वातावरण में आए बदलावों की वजह से गांवों को अपने आवास के लिए चुना है।

डिपार्टमेंट को यूजीसी ने अप्रैल 2013 में पंजाब के अर्बन व रूरल एरिया में गोरैया की मौजूदगी, जनसंख्या, नेरिटिंग व ब्रीडिंग के बारे में पता लगाने को प्रोजेक्ट दिया था। इस प्रोजेक्ट के तहत वर्ष 2018 तक पंजाब के 230 गांवों का सर्वे किया गया था। सर्वें में वैज्ञानिकों ने गांव-गांव शहर शहर जाकर ऐसे इलाकों की खोज की, जहां गौरेया काफी संख्या में थी।

पंजाब के इन गांवों में मिली गौरेया

सर्वे के अनुसार लुधियाना के गांव ताजपुर व गौसर, संगरूर के भसोड़ व रामपुर छन्ना, फिरोजपुर के गांव रसूलपुर और मानुवाला, अमृतसर के गांव तांगरा वमाद, पटियाला के हरियाओं कलां व डोडा, फरीदकोट के गांव चह व चंद बाजा, फतेहगढ़ साहिब के गांव रसूलपुर में कुल पक्षियों में से 45 से 90 प्रतिशत गोरैया मिलीं। लुधियाना के जस्सोवाल, कैंड, बारनहारा, शेखुपुरा, भैणी एरिना और कुलार, फिरोजपुर के पीर मोहम्मद, कोट करोर कलां, पटियाला के भिल्लोवाली व मंड खेहरा, कपूरथला के खाटी, अमृतसर के भिंदर, चौहान, बोइया व गगराह भाना, जालंधर के संघे खालसा, फरीदकोट के मचाकी व मोहाली के मिर्जापुर में कुल अन्य प्रजातियों के पक्षियों में से 25 से 45 प्रतिशत गोरैया पाई गई थी।

शहरों में कम पाई गई गोरैया

शोध के अनुसार लुधियाना के बीआरएस नगर, दुगरी, इंडस्ट्रियल एरिया, मॉडल टाउन, जनता नगर, बाड़ेवाल, रोज गार्डन में महज पांच प्रतिशत गोरैया पाई गई थी। पटियाला के सिटी एरिया में इनकी संख्या पांच से दस प्रतिशत और मुक्तसर के शहरी क्षेत्र में 20 प्रतिशत रही।

 

 

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