लुधियाना, [आशा मेहता]। महामारी से लड़ रहे कोरोना योद्धाओं के लिए यह समय सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण रहा। बहुत से कोरोना योद्धाओं को जान तक गंवानी पड़ी, लेकिन जो अब भी सेवा में जुटे हैं, उनमें से अधिकतर डिप्रेशन का शिकार हो गए हैं। कोरोना काल से पहले की स्थिति से तुलना करें तो इनमें डिप्रेशन का स्तर पांच गुणा से भी ज्यादा बढ़ गया है।

डीएमसी अस्पताल ने नौ मेडिकल कालेजों के 260 रेजिडेंट डाक्टरों व पीजी विद्यार्थियों पर की आनलाइन स्टडी

यह निष्कर्ष लुधियाना स्थित दयानंद मेडिकल कालेज एवं अस्पताल (डीएमसीएच) के अध्ययन में सामने आया है। यह आनलाइन अध्ययन प्रदेश के नौ मेडिकल कालेजों के 260 रेजिडेंट यानी जूनियर डाक्टरों व पीजी विद्यार्थियों पर किया गया था। इसमें 170 महिला व अन्य पुरुष डाक्टर शामिल थे। डीएमसीएच के डिपार्टमेंट आफ साइकेट्री के अध्ययन में पता चला कि कोरोना काल में 60 फीसद जूनियर डाक्टर डिप्रेशन व 67 फीसद एंगजाइटी (चिंता) के शिकार हो गए।

मेडिकल कालेजों में बिगड़ी जूनियर डाक्टरों की मानसिक सेहत, 60 फीसद में डिप्रेशन, 67 फीसद में चिंता बढ़ी

डिपार्टमेंट हेड व प्रोफेसर डा. रंजीव महाजन ने बताया कि कोविड काल से पहले जब हमने पंजाब के मेडिकल कालेजों में ऐसा ही अध्ययन किया था तो 11 फीसद डाक्टर डिप्रेशन और 17 फीसद चिंता के शिकार थे। एंगजाइटी का प्रतिशत खतरनाक रूप से बढ़ा है। डा. महाजन ने विदेश में हुए अध्ययन का भी हवाला दिया। उन्होंने बताया कि चीन में तनाव व चिंता 22 फीसद में ही मिली थी, जबकि 35 फीसद मेडिकल विद्यार्थी डिप्रेशन में थे। कई अन्य देशों में भी यह आंकड़ा भारत के मुकाबले कम है।

ये हैं प्रमुख कारण

  • -जूनियर डाक्टर व मेडिकल विद्यार्थी लंबी डयूटी और अस्पतालों के माहौल से तनाव में आ गए हैं।
  • -ये आइसीयू और आइसोलेट किए गए मरीजों के काफी नजदीक होते हैं। इसलिए इनमें संक्रमण का खतरा सबसे अधिक होता है। यही कारण है कि इनकी मानसिक सेहत पर असर पड़ा है।
  • -लगातार डयूटी के साथ ही उनकी परीक्षाएं भी नहीं हो रही हैं।
  • -डयूटी के दौरान रोज 100 या इससे भी अधिक मरीजों की मौत हुई, जिसे इतनी कम उम्र में डाक्टरों ने पहली बार देखा।
  • -इलाज के दौरान मरीज की मौत के बाद स्वजनों का व्यवहार काफी खराब होता है। कई स्वजन सारा दोष डाक्टरों पर मढ़ देते हैं, जिसका डाक्टरों के दिमाग पर गहरा असर पड़ता है।
  • -डाक्टरों का कंप्यूटर, लैपटाप व फोन पर स्क्रीन टाइम बढ़ गया, जिससे उदासी, बेचैनी, चिड़चिड़ापन और अवसाद बढ़ रहा है।

 क्या कर सकते हैं डाक्टर

अध्ययन में डाक्टरों के लिए सलाह भी दी गई है। वे नियमित एक्सरसाइज करें। सामाजिक रूप से संपर्क में रहें। नकारात्मकता से दूर रहें। नालेज अपडेट करने के लिए निर्धारित सीमा में ही न्यूज चैनल आदि देखें। जब भी किसी को अपने आप में कुछ बदलाव महसूस हो, तो तुरंत इलाज शुरू करें। लक्षणों को अनदेखा न करें।

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'' मरीज के स्वजनों को लगता है कि पेशेंट को कुछ होता है, तो डाक्टरों को फर्क नहीं पड़ता। पेशेंट की मौत पर हमें भी उतना ही दुख होता है, जितना परिवार के सदस्यों को होता है। हमें नींद नहीं आती, क्योंकि हमने कई दिनों तक उसे करीब से देखा होता है। रोजाना हम इमरजेंसी, वार्ड, आइसीयू में जाकर मरीजों से मिलते हैं। उनके संपर्क में रहते हैं। हमारा उनके साथ भावनात्मक जुड़ाव हो जाता है। स्वजनों को समझना चाहिए कि डाक्टर भी उनके दुख में हिस्सेदार हैं।

                                                                  - डा. रंजीव महाजन, डीएमसी के साइकेट्री डिपार्टमेंट के हेड।

Edited By: Sunil Kumar Jha