जेएनएन, लुधियाना : मॉडल टाउन एक्सटेंशन स्थित भगवान श्री लक्ष्मी नारायण धाम मंदिर में साप्ताहिक सत्संग के दौरान महामंडलेश्वर ब्रह्मर्षि श्री कुमार स्वामी द्वारा भेजे संदेश को पढ़ कर सुनाया। उन्होंने अपने संदेश में कहा कि गुरु का त्याग करने से अकाल मृत्यु होती है। मंत्र का जप छोड़ने से दरिद्रता आती है और गुरु तथा मंत्र दोनों का त्याग करने से नर्क मिलता है। मंत्र का उपदेश करने वाले को जो गुरु नहीं मानता वह सौ जन्मों तक कुत्ता होकर फिर चंडाल की योनि में जन्म लेता है। हे देवी, मेरा यह कथन कभी असत्य नहीं होता ऐसा मैं तीन बार कहता हूं कि यही सत्य है, सत्य है, सत्य है। जो शिष्य साधारण परिवेश में चुपचाप आकर गुरु से कृपा लेकर चला जाता है उस पर सदैव गुरु की कृपा रहती है। भगवान शिव ने ऐसे शिष्य के बारे में कहा है कि गुरु में निष्ठा ही परम तप है। यदि गुरु आपके घर, आश्रम अथवा भवन में आता है तो वह अत्यंत सौभाग्य का प्रतीक है। ऐसी स्थिति में शिष्य को अपना सब कुछ अर्पण कर देना चाहिए। गुरु वेदांत के अर्थो में प्रवक्ता है अत: अपने गुरु को उच्च सिंहासन पर बैठाकर उसी प्रकार पूजा करनी चाहिए, जिस प्रकार भगवान श्री कृष्ण ने सुदामा जी को अपने स्वर्ण मंडित सिंहासन पर बैठाकर धूप व दीप से पूजा की थी। इस प्रकार अपने गुरु के समक्ष आदरभाव से साधारणता का परिचय देते हुए उनकी वंदना करनी चाहिए, तभी व्यक्ति गुरु का पात्र बनता है। गुरु की कृपा से ही राज मिलता है और व्यक्ति राजा बनता है। निष्कपट, प्रेम और विनम्र भाव से जो व्यक्ति गुरु की शरण में आता है और कभी भी अपने बड़प्पन का प्रदर्शन नहीं करता, केवल उसी पर गुरु की कृपा होती है। ऐसा व्यक्ति कल्पना भी नहीं कर सकता कि गुरु उसे कब क्या दे दे। गुरु के समक्ष शिष्य को अहंकार से भरकर जोर से नहीं बोलना चाहिए। गुरु के समक्ष कभी भी यह शब्द नहीं बोलना चाहिए कि मैने यह काम किया। गुरु के समक्ष अपना प्रभुत्व दिखाना और व्याख्यान देना पूरी तरह वर्जित है। गुरु के सान्निध्य में केवल दास बनकर रहना चाहिए और गुरु की बात नहीं काटनी चाहिए तभी गुरु की कृपा होती है।

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