जागरण संवाददाता, कपूरथला : कृषि विज्ञान केंद्र कपूरथला के डायरेक्टर डा. सतवीर सिंह ने बताया कि पराली को जलाने से सिर्फ पर्यावरण ही दूषित नही होता बल्कि जमीन के पोषक तत्व भी नष्ट हो जाते हैं। पराली को आग लगाने से एक एकड़ में 25 किलो पोटाश और पांच किलो नाइट्रोजन नष्ट हो जाती है। दो किलो फासफोरस की बर्बादी होती है। आग लगाने की वजह से जमीन के 70 फीसदी माईक्रो न्यूट्रेन के नुकसान की भरपाई तो किसी भी कीमत पर नही हो पाएगी। अगर लगातार तीन साल खेत में पराली को मर्ज किया जाए तो रासायनिक खादों की 45 फीसदी जरुरत कम हो जाएगी।

पराली जलाने से नुकसान

फसल के अवशेष को जलाने से फसल के ऊपरी परत में मौजूद सूक्ष्म जीवों को नुकसान होता है। इससे मिट्टी की जैविक गुणवत्ता प्रभावित होती है। पराली जलाने से पर्यावरण के नुकसान से अधिक मिट्टी की उर्वरा शक्ति प्रभावित होती है। केवल एक टन पराली जलाने से 5.5 किग्रा नाइट्रोजन, 2.3 किग्रा फासफोरस, 25 किग्रा पोटैशियम और 1.2 किग्रा सल्फर जैसे मिट्टी के पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं। पराली की आग की गरमी से मिट्टी में मौजूद कई उपयोगी बैक्टीरिया और कीट भी नष्ट हो जाते हैं।

क्यों नही रूक रहा सिलसिला

पराली जलाने से रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर केंद्र सरकार की ओर से राष्ट्रीय पराली नीति बनाई गई है तथा इस पर राज्यों को सख्ती से पालन करने को कहा गया है। पराली को खेत में नष्ट करने का अभी तक कोई कारगार व उपयुक्त ढंग और मिशनरी सामने नही आई है। पीएयू व खेतीबाड़ी विभाग की तरफ से मरचर, हैपीसीडर व एसएमएस सिस्टम की मदद से पराली को खेत में मिलाने में काफी मदद मिलती है पर ये तमाम इतनी पुख्ता व्यवस्था नही है जिससे खेत अगली फसल के लिए पूरी तरह तैयार हो सके।

इससे कैसे बचा जाए

इस बार सुल्तानपुर लोधी क्षेत्र में पराली जलाने का कोई भी मामला सामने नही आया है। 99 प्रतिशत किसान पराली को खेत में मिला कर खाद बनाने में लगे है। गांव जार्जपुर के जागरुक किसान व इंग्लैड से वापस लौट कर खेती को तरजीह देने वाले युवा किसान कप्तान सिंह बताते है कि वह धान की कटाई के बाद 15 एकड़ में आलू की बिजाई करेंगे। इसके लिए उन्होंने इस बार पराली को बिलकुल भी आग ना लगाने का फैसला किया है। वह बिना किसी सब्सिडी के अपना मरचर लेकर आए है जिससे कंबाइन की धान की कटाई के तुरंत बाद उसे चला कर पराली को बारीक किया जाता है। इसके बाद रुटावेटर से जमीन को जोताई की जाती जाती है। इससे लगभग 65 से 75 फीसदी पराली की समस्या का हल हो जाता है।

Edited By: Jagran