मनोज त्रिपाठी, जालंधर। दोआबा में कांग्रेसी नेता व मंत्री और पूर्व सांसद राणा गुरजीत सिंह व दिग्गज कांग्रेसियों में वर्चस्व की लड़ाई की नींव 17 साल पहले पड़ी थी। तब से लेकर अभी तक विधानसभा या लोकसभा के चुनावों में राणा के खिलाफ कांग्रेसी ही बगावत करते रहे हैं। राणा हर बार विरोधियों को किनारे लगाकर नई सियासी पावर के साथ पार्टी में अपना कद बढ़ाते रहे हैं। उनकी सियासी अदावत की नींव वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव में पड़ी थी। उस चुनाव में राणा जालंधर के कांग्रेसियों को किनारे करके दिल्ली दरबार से जालंधर का लोकसभा चुनाव का टिकट हासिल करने में सफल रहे थे। उसके बाद से ही तत्कालीन कैबिनेट मंत्री अवतार हैनरी व सुखपाल सिंह खैहरा तथा दोआबा के अन्य दिग्गज कांग्रेसियों के साथ राणा का 36 का आंकड़ा बना रहा है। इस चुनाव में राणा तमाम विरोधों के बाद भी अपने दम पर जीत हासिल करने में सफल रहे थे। इस जीत ने राणा को चुनाव मैनेजमेंट का गुरु भी बना दिया था।

यह है हैनरी के विरोध की सियासत

राणा ने 2004 का चुनाव जीतने के बाद हैनरी के खास रहे दिनेश ढल्ल काली को अपने साथ खड़ा कर लिया था। उस समय तक काली सियासत में नार्थ हलके में अवतार हैनरी के दाएं हाथ के रूप में पहचान रखते थे, लेकिन काली के राणा के खेमे में आने के बाद कई सियासी कारोबारों में हैनरी को झटका लगा और राणा के सहयोग से काली ने उन कारोबारों पर कब्जा करना शुरू कर दिया था। इसके बाद 2007, 2012 और 2017 के चुनाव में काली ने हैनरी की खुलकर खिलाफत की और नार्थ हलके से टिकट की दावेदारी कर डाली। यही दावेदारी हैनरी व काली के बीच सियासी रंजिश बनकर मजबूत दीवार के रूप में खड़ी होती गई। इस बार काली आम आदमी पार्टी से जूनियर हैनरी के खिलाफ नार्थ हलके से उम्मीदवार हैं। हैनरी के गढ़ ढन्न मोहल्ले में काली का भी खासा वर्चस्व है। इससे अवतार हैनरी के बेटे व विधायक जूनियर हैनरी की मुश्किलें बढ़ गई हैं।

खैहरा भी 17 वर्षों से कर रहे हैं राणा का विरोध

कपूरथला के भुलत्थ से विधायक व कांग्रेसी नेता सुखपाल सिंह खैहरा व राणा के खिलाफ सियासी जंग जगजाहिर है। कपूरथला की सियासत में खैहरा को कमजोर करके खुद का कद बड़ा करने वाले राणा के खिलाफ खैहरा ने हर चुनाव में व उसके बाद कोई भी मौका नहीं छोड़ा है। 2017 के विधासभा चुनाव के बाद मुख्यमंत्री बने कैप्टन अमरिंदर सिंह की सरकार में राणा को कैबिनेट मंत्री बनाया गया था। खैहरा उस समय आम आदमी पार्टी में थे। वे राणा के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर लगातार शिकायतें करते रहे। कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रधान स्तर तक भ्रष्टाचार के मामलों को पहुंचाया। खास तौर पर रेत खनन के ठेकों को लेकर हुई कथित धांधली सहित तमाम मुद्दों को खैहरार ने नेता प्रतिपक्ष के तौर पर भुनाया और राणा को मजबूरी में कैप्टन की कैबिनेट से बाहर हो गए। इस बार खैहरा को चुनाव में भुलत्थ से सबसे डर राणा के विरोध का ही सता रहा है।

राणा का बेटा बना चीमा के विरोध का कारण

राणा गुरजीत सिंह का बेटा राणा इंदर प्रताप सुल्तानपुर लोधी से चुनाव लड़ने के लिए काफी समय से लाबिंग कर रहे थे। इसके चलते नवजेत सिंह चीमा व राणा के बेटे के बीच सियासी शीत युद्ध व वर्चस्व की लड़ाई कई सालों से चल रही है। चीमा मौजूदा विधायक हैं और सुल्तानपुर लोधी कपूरथला से सटा है। इसलिए राणा अपना गढ़ मजबूत करने के लिए सुल्तानपुर लोधी के किले को भी सुरक्षित करना चाहते हैं। चीमा के लिए भी यह लड़ाई अहम की बन चुकी है। अगर राणा का बेटा वहां से स्थापित हो जाता है तो आने वाले समय में चीमा की सियासत खत्म हो सकती है। यही वजह है कि चीमा भी राणा के खिलाफ खुलकर मैदान में आ गए हैं।

केपी के लिए बैटिंग से चलते फगवाड़ा में भी विरोध

2004 में जब राणा गुरजीत सिंह जालंधर से लोकसभा चुनाव लड़े थे तो जालंधर के चारों विधानसभा हलकों से राणा मतदान में पिछड़ गए थे। उससे पहले के लोकसभा चुनावों में जालंधर की सीट कांग्रेस की झोली में जाती रही है। ज्यादातर चुनावों का यही ट्रेंड रहा है, लेकिन देहात की सीटों से राणा को बढ़त मिली थी और उनके खिलाफ चुनावी मैदान में उतरे पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल के बेटे नरेश गुजराल को शहर की विधानसभा सीटों से बढ़त मिली थी। केवल वेस्ट (उस समय साउथ)की सीट से राणा को 20 हजार से ज्यादा वोटों से बढ़ मिली थी। इस सीट से मोहिंदर सिंह केपी विधायक थे। इस बार केपी का टिकट कट चुका है और राणा के करीबी सुशील रिंकू को फिर से कांग्रेस ने मैदान में उतारा है। केपी का कर्ज उतारने के लिए राणा फगवाड़ा की रिजर्व सीट पर केपी को उम्मीदवार बनने के लिए लाबिंग कर रहे हैं। इसके चलते बलविंदर धालीवाल भी राणा के खिलाफ लाबिंग करने वाले नेताओं की टीम में शामिल हो गए हैं।

Edited By: Pankaj Dwivedi