जालंधर, जेएनएन। तांत्रिकों के लिए यह तंत्र-मंत्र सिद्धि करने वाली नीले स्वरूप वाली देवी हैं। साधारण भक्त महाकाली और तारा देवी में भेद नहीं कर सकते, इसीलिए इनके पावन मंदिरों को भी महाकाली का मंदिर पुकारा जाता है। महाकाली का स्वरूप श्यामवर्ण का है और उनके गले में मुंडमाला डाली हुई होती है, परंतु तारा देवी के शरीर पर बाघचर्म के वस्त्र होते हैं। महाकाली और तारा देवी दोनों की जिह्वा रक्त से लपलपाती हुई बाहर दर्शन देती है।

एक पौराणिक कथा के अनुसार जब सागर मंथन हुआ तो उसमें से 14 रत्न निकले थे, जिनमें से एक विष का भरा कुंभ भी था। हलाहल से प्राणीमात्र की रक्षा के लिए भगवान शंकर ने उसे स्वयं पी लिया, जिससे वह नीलकंठ कहलाए। कथा में कहा गया है कि विषपान करते ही भगवान शंकर मूर्छित हो गए और देवी तारा ने अपनी गोद में लेकर अपनी तांत्रिक शक्ति से उन्हें स्वस्थ कर दिया। उसी दिन से भगवती तारा देवी में तंत्र-मंत्र और जादू-टोना करने वालों का विश्वास बढऩे लगा।

जालंधर का वध करने के बाद तारा देवी के धाम पर भगवान शिव ने किया था प्रायश्चित

एक अन्य कथा के अनुसार जब भगवान शंकर ने अपनी कोपाग्नि से जन्मे दैत्यराज जलंधर का भीषण युद्ध में वध कर दिया तो इस पाप से मुक्ति पाने के लिए तारा देवी के पावन धाम पर आकर उन्होंने प्रायश्चित किया था। इस देवी के चमत्कारों के बारे में कई कथाएं जालंधर के लोग सुनाते हैं। तारा देवी का यह प्राचीन पावन मंदिर जालंधर की चारदीवारी के भीतर है। केवल दो मंदिर ही जालंधर नगर के अंदर स्थापित किए गए थे। एक ज्वरासुर की पत्नी भगवती शीतला और दूसरी तंत्र-मंत्र की शक्तियों को देने वाली तारा देवी हैं।

तारा देवी के बारे में कहा गया कि यह बलि भी लेती हैं। उन्हें रक्त बहुत प्रिय लगता है। वह पापियों को तारने वाली माता भी कही जाती हैं। बौद्ध संप्रदाय में तारा देवी की नील सरस्वती के तौर पर पूजा होती है। जालंधर में इनका पावन स्थान जवंदलाल बाग के पीछे मिट्ठा बाजार में स्थित है। वहां इसे महाकाली मंदिर के नाम से पुकारा जाता है।

 

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Posted By: Pankaj Dwivedi

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