कमल किशोर, जालंधर

विश्व में खेल नगरी के नाम से प्रसिद्ध जालंधर की खेल इंडस्ट्री के साथ दो दशक से खेल हो रहा है। 189 देशों को खेल उत्पादों का एक्सपोर्ट करने वाली जालंधर की खेल इंडस्ट्री सरकारी उदासीनता के चलते तबाही के कगार पर पहुंच चुकी है। सरकारी नीतियों के चलते हजारों मैन्युफेक्चर्स ट्रेडिंग के कारोबार में तब्दील हो चुके हैं। कभी सीएसटी, तो कभी वैट अब जीएसटी की मार खेल इंडस्ट्री को पीछे की ओर धकेल रही है। चाइना व ताइवान के उत्पाद पर एंटी डपिंग ड्यूटी न होने की वजह से जालंधर की घरेलू इंडस्ट्री खत्म हो रही है। स्किल लेबर न होने की वजह से लेदर बॉल इंडस्ट्री मेरठ में शिफ्ट हो चुकी है।

जालंधर में आरएंडडी डवलपमेंट सेंटर खोलने के लिए उद्यमी दो दशक से माग कर रहे हैं परंतु किसी भी राजनीतिक दल ने न तो इंडस्ट्री की सुध ली और न ही सेंटर का निर्माण करवाया। इंडस्ट्री स्किल लेबर न होने का दंश झोल रही है। वहीं करोड़ो रुपये का वैट रिफंड फंस जाने से भी इंडस्ट्री पर मार पड़ रही है। सी-फार्म न मिलने से उद्यमियों का वैट रिफंड रुका पड़ा है। दो दशक में तीन हजार करोड़ रुपये का कारोबार करने वाली इंडस्ट्री मौजूदा 1800 करोड़ रुपये में सिमटकर रह गई है। जालंधर इंडस्ट्री में 2500 छोटी-बड़ी खेल इकाईया है। कठुआ में शिफ्ट हुई बैट इंडस्ट्री

जम्मू-कश्मीर से कश्मीर विल्लो पंजाब में बैन होने से जालंधर की अधिक इंडस्ट्री कठुआ में शिफ्ट हो गई है। दस वर्ष पहले जालंधर में 400 बैट बनाने वाले यूनिट थे। अब मात्र चालीस के करीब रह गए हैं। बैट को तैयार करने के लिए रॉ मैटीरियल जैसे बैट का हैंडल, धागा, ग्रिप, स्टिकर जालंधर से कठुआ जाता है। वहा बैट तैयार होकर जालंधर में आता है। अभी तक सरकार पंजाब में कश्मीरी विल्लो के बैन को नहीं हटा पाई है। हालात ये हैं कि विस्व प्रसिद्ध जालंधर की 80 फीसद बैट इंडस्ट्री अब बैट बनाने की बजाय बैट का हैंडल लगाने का काम कर रही है। हैंडल भी बास से बनता है। पंजाब से बास की खेती खत्म होती गई और अब हैंडल भी बाहर से बनकर आ रहा है। जालंधर में केवल उसे बैट में फिट किया जा रहा है। लेदर बॉल इंडस्ट्री के 80 प्रतिशत यूनिट हुए बंद

दस वर्ष पहले जालंधर इंडस्ट्री में 60 लेदर बॉल तैयार करने वाले यूनिट थे। अब सिर्फ 15 यूनिट रह गए हैं। इंडस्ट्री को महंगा कच्चा चमड़ा मिलना, महंगी लेबर के चलते लेदर बॉल निर्माता को यूनिट बंद करने पड़े। नई पीढ़ी इस कारोबार को आगे लेकर नहीं जाना चाहती। बाल को सिलने का काम हाथों से किया जाता है। लेबर को सही ट्रेनिंग की सुविधा न होने के कारण जालंधर की बाल इंडस्ट्री भी मेरठ में शिफ्ट हो गई। इसके साथ ही फुटबाल इंडस्ट्री और शॅटल कॉक इंडस्ट्री भी मेरठ शिफ्ट हो गई।

हॉकी का मक्का-मदीना और हॉकी उद्योग खात्मे की तरफ

चीन व ताइवान की कंपोजिट हॉकी ने जालंधर के हाकी उद्योग की रीढ़ तोड़ दी है। विशेष किस्म का फाइबर से तैयार होने वाली कंपोजिट हॉकी को मान्यता मिलने के बाद जालंधर में बास व शहतूत की लकड़ी से बनने वाली हॉकी के खरीदार न के बराबर रह गए हैं। हॉकी उद्योग को तकनीकी सहयता न उपलब्ध हो पाने के कारण जालंधर में कंपोजिट हॉकी बनाने के प्लाट नहीं विकसित हो सके। कुछ उद्योगपतियों ने अपने स्तर से जरूर प्लाट लगाए हैं। जिनके दम पर जालंधर का हॉकी उद्योग सास ले रहा है। खिलाड़ी भी पलायन को मजबूर

जालंधर के खिलाड़ियों को सुविधाएं न मिल पाने के कारण विश्व स्तरीय प्रतिस्पर्धा की तैयारी के लिए खिलाड़ियों को जालंधर से बाहर दूसरे शहरों को पलायन करना पड़ रहा है। स्वीमिंग, हाकी, बैडमिंटन व क्रिकेट जैसे खेलों के लिए भी जालंधर में न तो स्वीमिंग पूल हैं और न ही मैदान। नतीजतन खिलाड़ियों को दूसरे शहरों में जाकर प्रैक्टिस करनी पड़ती है। एकमात्र स्टेडियम ब‌र्ल्टन पार्क को पाच साल पहले तोड़ डाला गया। उसके बाद से आज तक उसे बनाया ही नहीं जा सका है। नतीजतन छोटे-छोटे क्रिकेट के मैदानों में खिलाड़ियों को प्रैक्टिस के लिए मजबूर होना पड़ रहा है या फिर वह दूसरे शहरों का रुख कर रहे हैं। वैट और जीएसटी रिफंड के हों सही इंतजाम

खेल उद्यमी रविंदर धीर ने कहा कि वैट व जीएसटी रिफंड न होने की वजह से इंडस्ट्री सरवाइव नहीं कर रही है। आरएंडडी डवलपमेंट सेंटर न बनने के चलते स्किल्ड लेबर इंडस्ट्री को नहीं मिल रही है। चीन व ताइवान से आने वाले खेल उत्पाद पर अधिक से अधिक एंटी डपिंग ड्यूटी लगनी चाहिए। ताकि खेल इंडस्ट्री में तैयार होने वाला उत्पाद बिक्री हो। हटाया जाए विल्लो पर बैन

आरके स्पो‌र्ट्स के डायरेक्टर पुनीत नारंग ने कहा कि जम्मू-कश्मीर से कश्मीरी विल्लो पंजाब में बैन होने की वजह से जालंधर इंडस्ट्री कठुआ शिफ्ट हो गई। हालाकि बैट का रॉ मैटीरियल जालंधर से तैयार होता है। जम्मू से बैट तैयार होकर जालंधर इंडस्ट्री में पहुंचता है। कश्मीरी विल्लो लकड़ी पर बैन हटना चाहिए। स्किल्ड लेबर समय की जरूरत

बीएंडबी इंटरप्राइजेज के डायरेक्टर मोहित ने कहा कि कच्चा चमड़ा व स्किल लेबर इंडस्ट्री के पास न होने की वजह से बंद हो गई। लेदर बॉल का कारोबार मेरठ में फल फूल रहा है। मेरठ में कच्चा चमड़ा व लेबर आसानी से मिल जाती है। पहले जालंधर इंडस्ट्री में 60 लैदर बॉल तैयार करने वाले यूनिट थे। आरएंडडी डेवलपमेंट सेंटर जल्द बने

स्पोर्टिग सिडिंकेट के डायरेक्टर अलकेश कोहली ने बताया कि खेल इंडस्ट्री की दो दशक से आरएंडडी डवलपमेंट सेंटर की जरूरत है। एक्सपोर्ट करने वाले उद्यमियों को सरकार की ओर इंसेंटिव दिए जाने चाहिए ताकि इंडस्ट्री प्रफुल्लित हो सके। इंडस्ट्री की सबसे बड़ी माग स्किल्ड लेबर है जो की जालंधर खेल इंडस्ट्री में न के बराबर है।

Posted By: Jagran

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