जालंधर, जेएनएन। अंधकार पर प्रकाश की विजय का पर्व है दिवाली। इसी प्रकाश की एक किरण में सात रंग समाहित होते हैं और ठीक उसी तरह देश के इस सबसे बड़े त्योहार में परंपराओं के विभिन्न रंग शामिल हैं। जालंधर में देश के कोने-कोने से आ कर लोग बसे हैं और वे दीवाली की खुशियों व रोशनियों को यहां अपनी-अपनी संस्कृति के अनुसार सजाते हैं। विविधता में एकता की इस मिसाल पर पेश है शाम सहगल की एक रिपोर्ट-

इको फ्रैंडली मनाएंगे दिवाली

हिमाचल जनहित सभा के संस्थापक ओपी जमवाल के अनुसार इस बार हिमाचल कालोनी के लोगों ने ईको फ्रैंडली दिवाली मनाने का फैसला किया है। पर्यावरण सरंक्षण के लिए कम से कम पटाखे चलाएंगे। कालोनी में लोगों ने घरों को खूब सजाया है। लोग निजी स्तर पर हिमाचली पकवान तैयार कर किसी एक के घर में संयुक्त खाना करते हैं। इसके अलावा दिवाली के उपहारों का भी अदान प्रदान होता है।

हिमाचल जनहित सभा के संस्थापक ओपी जमवाल, अजय जगपात और हेमंत बेरा अपने-अपने समुदाय में दिवाली सेलिब्रेशन के तौर-तरीके के बारे में बताते हुए।
 

तीन दिन चलती है पूजा

महाराष्ट्र से आकर जालंधर में बसे अजय जगपात बताते हैं, ‘अपनी परंपरा के अनुसार ही हम यहां पर भी तीन दिन दिवाली की पूजा विधिवत रूप से पूरी करते हैं। दिवाली से एक दिन पूर्व मां की पूजा शुरू कर देते हैं।’ गोल्ड पॉलिश का काम करने वाले अजय बताते हैं कि दिवाली के दूसरे दिन विश्वकर्मा पूजा साथ गोवर्धन पूजा की भी पंरपरा है। इसे शहर में रहने वाले महाराष्ट्र के परिवार विधिवत पूरा करते हैं।
 

दिन में मां लक्ष्मी तो रात को होती है मां महाकाली का पूजन

मूल रूप से बंगाल के रहने वाले हेमंत बेरा गोल्ड ज्वेलरी तैयार करने का काम करते हैं। वह कहते हैं, ‘हमारे परिवार में दिवाली पर दिन के समय मां लक्ष्मी की पूजा करने की परंपरा है जबकि, रात में मां महाकाली की पूजा की जाती है। यही कारण है कि दिवाली की खरीदारी में सभी बंगाली घर में मां महाकाली की प्रतिमा जरूर लेकर आते हैं। जालंधर में इस बार कलां बाजार में हम लोग दिवाली की रात संयुक्त रूप से बंगाली पूजा करवाने जा रहे हैं।

श्री सत्यनारायण पूजा व मीठी मट्ठियां बनाती हैं दिवाली को खास

कश्मीरी परिवार की सुनीता काक के मुताबिक दिवाली पर मां लक्ष्मी की पूजा तो सामान्य रूप से ही की जाती है। जबकि, कश्मीर में भगवान श्री सत्यनारायण की पूजा की परंपरा भी शुरू से रही है। इसे यहां पर भी पूरा किया जाता है। उन्होंने कहा कि दिवाली पर घर में ही मीठी मट्ठियां तैयार करके भगवान सत्यनारायण को भोग लगाया जाता है। इन्हीं मट्ठियों को बाद में मित्रों-संबंधियों को वितरित किया जाता है। इसका प्रमुख कारण मां लक्ष्मी को प्रसन्न करना होता है।

मूल रूप से कश्मीरी सुनीता काक, कुमाऊं के दुर्गा सिंह बिष्ट और गढ़वाल के लोकेंद्र कुमार गोसाईं।

एक दिन पहले शुरू हो जाती है मां लक्ष्मी की पूजा

उत्तराखंड के रहने वाले व कुमाऊं विकास मंडल के प्रधान दुर्गा सिंह बिष्ट बताते हैं कि दिवाली से एक दिन पहले ही मां लक्ष्मी की पूजा शुरू हो जाती है। पहले दिन गन्ने के साथ पूजा करने की परंपरा है। जबकि, दिवाली वाले दिन विधिवत मंत्रोच्चारण के साथ मां लक्ष्मी की पूजा की जाती है। इसी तरह दिवाली वाले दिन ताजे फूलों के साथ मां लक्ष्मी का दरबार सजाया जाता है। यही परंपरा हमने जालंधर में भी बरकरार रखी है।

11 दिन बाद भी मनाई जाती है दिवाली

उत्तराखंड में दो तरह की दिवाली मनाई जाती है। जालंधर में रहने वाले परिवार भी इन्हें विधिवत पूरा करते हैं। इस बारे में संयुक्त गढ़वाल सभा के महासचिव लोकेंद्र कुमार गोसाईं बताते हैं कि दिवाली के 11 दिनों बाद भी दिवाली मनाने की परंपरा है। दरअसल, दिवाली के 11 दिनों के बाद नेपाल के राजा युद्ध में विजयी हो कर लौटे थे, तो लोगों ने उनके स्वागत में भी दीपमालाएं की थीं। यह परंपरा आज भी कायम है। जालंधर में भी संस्था के सदस्य दो बार दिवाली मनाते हैं।  

Posted By: Pankaj Dwivedi

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