जालंधर, [मनोज त्रिपाठी]। Punjab New CM: चरणजीत सिंह चन्‍नी की ताजपोशी के बाद पंजाब कांग्रेस में नए समीकरण बनने की संभावना है। इस पर विपक्षी दलों की अभी से नजरें जम गई हैं। पंजाब कांग्रेस की कलह में विपक्षी दल अपनी अपनी संभावनाएं तलाशने लगे हैं। इन दलों की नजरें अब कैप्टन अमरिंदर सिंह के अगले कदम पर भी है। पंजाब कांग्रेस में बनने-बिगड़ने वाले समीकरणों का राज्‍य की सियासत पर बड़ा असर पड़ेगा।

भारतीय जनता पार्टी व आम आदमी पार्टी सहित शिरोमणि अकाली दल भी इसे पंजाब की सत्ता में स्थापित होने के अच्छे मौके के रूप में देख रहा है। विपक्ष की तरफ से कैप्टन के इस फैसले को लेकर कांग्रेस को ही घेरा जा रहा है, न की कैप्टन अमरिंदर सिंह को। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि कैप्टन किसके साथ जाएंगे या फिर अपनी अलग पार्टी बनाएंगे..या फिर कांग्रेस में ही रहकर विरोधियों को पस्त करने की कवायद करेंगे। जो भी कदम होगा, उसका फायदा किसी न किसी अन्य विपक्षी दल को होगा।

भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता व पूर्व मंत्री मनोरंजन कालिया का मानना है कि कैप्टन ने विधानसभा चुनाव को लेकर सभी दलों की सियासत को अपनी तरफ खींच लिया है और सभी उनके अगले कदम की प्रतीक्षा कर रहे हैं कि वह अलग पार्टी बनाते हैं या कोई और फैसला लेते हैं।

बेअदबी व कृषि कानूनों के कारण बैकफुट पर चल रहे शिरोमणि अकाली दल को भी कैप्टन के इस्तीफे के बाद एक यह उम्मीद है कि कम से कम किसानों के मुद्दे पर अब कांग्रेस की मजबूत पकड़ को वह ढीला कर सकेगी। कैप्टन ने किसानों के आंदोलन को पूरा समर्थन देकर बड़ा दांव चला था। अमरिंदर सिंह ने शुरू से ही किसान आंदोलन को कूटनीतिक तरीके से हैंडल किया था।

शिरोमणि अकाली दल के प्रधान सुखबीर सिंह बादल ने कांग्रेस के इस पूरे प्रकरण पर सधी हुई ऐसी टिप्पणी की है कि जिससे कैप्टन के बजाय कांग्रेस कठघरे में खड़ी हो। इस्तीफे के बाद सबसे ज्यादा लाभ का अवसर देखने वाली आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता राघव चड्ढा का भी यही कहना है कि कांग्रेस डूबता जहाज है। कांग्रेस ने पंजाब की जनता के साथ धोखा किया है। उन्होंने कैप्टन अमरिंदर सिंह पर नहीं साधा बल्कि कांग्रेस पर निशाना साधा है। वहीं भाजपा के प्रदेश प्रधान अश्वनी शर्मा ने भी पूरे प्रकरण पर सिद्धू व कांग्रेस को ही निशाने पर लिया है। भाजपा नेता मास्टर मोहन लाल ने तो कैप्टन को सीधे-सीधे भाजपा की राह दिखा दी है।

कैप्टन को हटाने और चन्नी को मुख्यमंत्री बनाने के बाद सुनील जाखड़ व सुखजिंदर रंधावा जैसे दिग्गजों की हसरतें धराशायी हुई हैं। यह माना जा रहा है कि कांग्रेस में अभी सब कुछ शांत होने वाला नहीं है। कांग्रेस की इसी कलह की संभावना में अन्य दल अवसर तलाश रहे हैं। एक तो उन्हें नाराज कांग्रेसियों को अपनी ओर लाने का मौका मिलेगा, दूसरे अगर ऐसा न भी कर पाएं तो कांग्रेस के कमजोर होने का फायदा तो मिलेगा ही।

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