जालंधर, [मनीष शर्मा]। यातायात विभाग और पुलिस की ढील शहर की सुरक्षा के लिए किसी भी समय बड़ा खतरा बन सकती है। वजह यह है कि नियमों के विपरीत शहर में 'अप्लाइड फॉर' यानी एएफ नंबर प्लेट लगे कई वाहन सड़कों पर दौड़ रहे हैं। इन वाहनों में केवल कारें नहीं, बल्कि दोपहिया वाहन भी शामिल हैं। खतरा यह है कि चोरी व छीनाझपटी से लेकर लूट और अन्य बड़ी आपराधिक वारदात में इनका इस्तेमाल हुआ या कोई दूसरा हादसा हो गया तो अपराधियों को ट्रेस करना पुलिस के लिए भी चुनौती बन जाएगा।

उधर, नियम यह कहते हैं कि कॉमर्शियल वाहन को छोड़कर कोई भी दूसरा वाहन बिना पक्का नंबर लगे शोरूम से बाहर नहीं निकल सकता। केवल दूसरे राज्य में वाहन का रजिस्ट्रेशन करवाने वालों को ही इस शर्त में एक महीने की छूट मिलती है, लेकिन उसकी जगह एएफ नहीं बल्कि टेंपरेरी रजिस्ट्रेशन नंबर लगाकर ही शोरूम से बाहर निकाला जाता है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर पक्का नंबर लगे या टेंपरेरी नंबर लगाए बिना कोई वाहन शोरूम से नहीं निकल सकता तो यह वाहन सड़कों पर कैसे दौड़ रहे हैं?

सवाल इस बात को लेकर भी उठ रहे हैं कि क्या वाहन मालिक खुद एएफ नंबर प्लेट लगाकर घूम रहे हैं या किसी स्तर पर वाहन एजेंसियों और यातायात विभाग में कथित तौर पर 'सांठगांठ' का खेल तो नहीं चल रहा। क्योंकि शहर में हालात ऐसे हैं कि एएफ नंबर प्लेट लगे वाहनों पर न यातायात विभाग अंकुश लगा रहा है और न ही हेलमेट, सीट बैल्ट न लगाने पर जगह-जगह चालान काटने वाली ट्रैफिक पुलिस कोई कार्रवाई कर रही है।

यह है नियम

पहले नियम था कि गाड़ियों को एक महीने के लिए टेंपरेरी नंबर दिया जाए, ताकि वो डीटीओ दफ्तर से इस दौरान पक्का नंबर ले लें। लगभग तीन साल पहले नंबर अलॉट करने का काम ऑटोमोबाइल एजेंसियों को दे दिया गया। फिर यह नियम बना दिया गया कि शोरूम से कार या टू-व्हीलर तभी बाहर निकलेगा, जब उसे पक्का रजिस्ट्रेशन नंबर अलॉट हो जाएगा। अगर किसी ने वीआईपी नंबर भी लेना है तो पहले वो ऑनलाइन बोली में नंबर खरीदेगा और फिर उसकी नंबर प्लेट वाहन पर लगेगी, तभी वाहन शोरूम से बाहर आएगा। केवल दूसरे राज्यों में वाहन का रजिस्ट्रेशन कराने या कॉमर्शियल वाहनों को यह छूट दी गई है कि वो एक महीने के भीतर पक्का नंबर लगवा लें, लेकिन तब तक उन पर टेंपरेरी नंबर जरूरी है।

ऐसे है खतरा

कहीं लूट में किसी गाड़ी का इस्तेमाल किया जाता है तो पुलिस के पास उसे ट्रेस करने का सबसे आसान जरिया गाड़ी का नंबर है। इस नंबर से पुलिस उसके मालिक को ट्रेस कर लेती और अपराधी पकड़ा जाता है। कई बार पुलिस को किसी सूचना या शहर में संदिग्ध गतिविधि की शिकायत मिलने पर पुलिस द्वारा वाहन को उसके नंबर से ट्रेस कर लिया जाता है। अगर गाड़ी में नंबर ही नहीं लिखा होगा तो उसे आसानी से ट्रेस करना मुमकिन नहीं। शहर में एक ही मॉडल की कई ऐसी कारें और कुछ दो पहिया वाहन घूम रहे हैं जिनकी नंबर प्लेट पर एएफ लिखा गया है। ऐसे में अगर इस तरह के वाहनों में कोई किसी वारदात को अंजाम देकर निकल जाए तो पुलिस पीड़ित के साथ साथ पुलिस के लिए भी मुश्किल खड़ी हो जाएगी। हालात गंभीर इसलिए भी हैं कि इन गाड़ियों पर टेंपरेरी नंबर तक नहीं लगा हुआ है।

खतरे को देख बने थे जिला कोड

पहले पंजाब में पीआइएम, पीबीक्यू छोटे डिजिट के नंबर दिए जाते थे। जब तीन दशक पहले मोटर व्हीकल एक्ट बना तो बकायदा नंबर को जिला कोड अलॉट कर दिए गए। इसमें पीबी पंजाब का कोड और उसके आगे जीरो एक, जीरो दो, जीरो तीन आदि डिस्ट्रिक्ट कोड दिए गए, जिसमें जालंधर का कोड पीबी 08 है। ऐसे ही बाकी जिलों को भी कोड दिए गए, ताकि अगर कोई मुखबिरी मिले या कोई अपराधी गाड़ी से भागे तो तो नंबर से उसका आरटीए या एसडीएम दफ्तर से रिकॉर्ड निकलवाकर ट्रेस किया जा सके।

यह गंभीर मामला है। जल्द ही ऐसी गाड़ियों पर कार्रवाई की जाएगी। अगर ऑटोमोबाइल एजेंसियां (डीलर) एएफ नंबर प्लेट लगे वाहन शोरूम से बाहर निकाल रहे हैं तो उनके खिलाफ भी एक्शन लिया जाएगा।

-गुरप्रीत खैहरा, स्टेट ट्रांसपोर्ट कमिश्नर।

अगर नियम के विपरीत गाड़ियां बिना पक्के नंबर शोरूम से बाहर आ रही हैं तो सख्त एक्शन लिया जाएगा। वहीं फील्ड में तैनात ट्रैफिक पुलिस को आदेश जारी किए जा रहे हैं कि एएफ नंबर प्लेट लगे वाहनों को रोककर न केवल कार्रवाई की जाए बल्कि पूरी पड़ताल की जाए कि एएफ नंबर लगाने के पीछे का रहस्य क्या है।

-नरेश डोगरा, डीसीपी ट्रैफिक, जालंधर।

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