सुनील प्रभाकर, जालंधर : आतंकवादियों का मुकाबला करते हुए सीने पर गोली खाकर शहीद हुए हवलदार साधू सिंह का बेटा आज रिक्शा चलाने को मजबूर है। बहु इलाज के अभाव में पल-पल मौत से जूझ रही है। अपने पहाड़ जैसे दुख को पीएपी मैदान में जब शहीद हवालदार साधु सिंह की विधवा जीत कौर ने पुलिस अधिकारियों के सामने बयान किया तो सबकी आंखें नम हो गई। यहां डीजीपी सुरेश अरोड़ा रविवार को 69वें पुलिस शहीदी दिवस में शहीदों को श्रद्धांजलि देने पहुंचे थे। जीत कौर ने पुलिस अधिकारियों से हाथ जोड़कर गुहार लगाई कि अगर विभाग शहीदों का जरा भी सम्मान करता है तो उनके पोते को कास्टेबल की नौकरी पर रख लें ताकि परिवार को नारकीय जिंदगी से छुटकारा मिल सके। जीत कौर ने कहा कि उनके पति ने पंजाब की अमन शाति के लिए शहादत दी। पुलिस विभाग को गर्व करने का मौका दिया तो फिर उनका परिवार आज इस हालात में क्यों है। बठिंडा की जीत कौर ने बताया कि उनके पति साधू सिंह 29 अगस्त, 1990 को आतंकवादियों से लोहा लेते हुए बाघा पुराना में शहीद हुए थे। फर्ज की राह पर कुर्बान हुए उसके पति ने आतंकियों के सामने पीठ नहीं दिखाई थी। उस वक्त उनके सीने पर लगी आतंकियों की गोलियां इस बात की गवाह हैं। एक बेटे को तो पुलिस विभाग ने तरस के आधार पर नौकरी दे दी। वह अपने परिवार में व्यस्त है। दूसरा बेटा जिसके पास वह रह रही हैं, घोर गरीबी में जीवन जी रहा है। शहीद का बेटा रिक्शा चला कर किसी तरह घर का गुजारा चला रहा है। बहू बीमार है, लंबे समय से डीएमसी लुधियाना में उसका इलाज चल रहा है। जो कुछ था बहू के इलाज पर लगा दिया। अब इलाज कराने की भी हैसियत नहीं रही। तंगहाली के चलते उसका इलाज बीच में ही बंद करने को मजबूर होना पड़ा। बीमार बहू इलाज के अभाव में पल-पल मौत का इंतजार कर रही है। जीत कौर ने कहा कि वो हर साल पुलिस विभाग की और से आयोजित किए जाने वाले शहीदी दिवस पर अपनी फरियाद लेकर उच्च पुलिस अधिकारियों के पास इस उम्मीद के साथ आती है कि पुलिस विभाग अपने शहीद के परिवार के इस मामले पर सहानुभूति से विचार करेगा। उन्हें डीजीपी सुरेश अरोड़ा से बहुत उम्मीदें हैं।

Posted By: Jagran

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