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जालंधर, [मनीष शर्मा]। शहर की सुरक्षा से लेकर अपराधिक मामलों की जांच व ट्रैफिक संभालने के लिए सरकार ने पंजाब पुलिस सर्विस (पीपीएस) अफसरों पर ही भरोसा जताया है। सरकार के नए आदेश में इन सभी कामों के लिए सिर्फ पीपीएस अफसरों की नियुक्ति की गई है। डीसीपी स्तर के पांच में से कोई भी अधिकारी आइपीएस नहीं है।

इससे पहले भी डीसीपी इन्वेस्टिगेशन व लॉ एंड ऑर्डर पर पीपीएस अफसरों की ही नियुक्ति रही है। पुलिस कमिश्नरेट में सिर्फ कमिश्नर समेत तीन आइपीएस हैं। हालांकि पुलिस कमिश्नर गुरप्रीत सिंह भुल्लर भी पीपीएस से तरक्की पाकर आइपीएस बने हैं। वहीं, जालंधर रूरल पुलिस में तो पक्के तौर पर कोई आइपीएस अधिकारी है ही नहीं। सिर्फ बतौर ट्रेनी एक महिला आइपीएस अधिकारी हैं। जिन्हें नकोदर सब डिवीजन में बतौर एएसपी में तैनात किया गया है।

यूपीएससी की कठिन परीक्षा पास कर सीधे आइपीएस बनने वाले अफसरों के प्रति सरकार के इस रवैये की महकमे के भीतर खूब चर्चा है और सिर्फ पीपीएस अफसरों को ही फील्ड ड्यूटी देने को लेकर भी कई तरह के कयास लग रहे हैं।

35 अफसरों की फौज, सिर्फ दो आइपीएस

पुलिस कमिश्नरेट में इस वक्त एसीपी से पुलिस कमिश्नर तक लगभग 35 अफसरों की फौज है। जिसमें सिर्फ दो ही आइपीएस अधिकारी हैं। इसमें एडीसीपी हेडक्वार्टर तैनात डॉ. सचिन गुप्ता व एडीसीपी-वन डी. सुडरविली हैं। इनमें एडीसीपी सुडरविली को ही फील्ड ड्यूटी सौंपी गई है। इसके अलावा सारे अफसर पीपीएस ही हैं। पिछले चार दिन में सरकार ने यहां पर चार नए पीपीएस अफसरों को डीसीपी बनाकर भेजा है। जिसमें इन्वेस्टिगेशन के डीसीपी गुरमीत सिंह पहले से ही यहां हैं। अब डीसीपी डिटेक्टिव अमरीक सिंह पवार, डीसीपी लॉ एंड ऑर्डर बलकार सिंह, डीसीपी हेडक्वार्टर अरूण सैनी व डीसीपी ट्रैफिक नरेश डोगरा भी पीपीएस ही लगाए गए हैं।

रूरल पुलिस में सिर्फ अंडर ट्रेनी

आइपीएस जालंधर रूरल पुलिस की बात करें तो यहां पर एसएसपी तैनात नवजोत सिंह माहल पीपीएस अफसर हैं। उनके नीचे दो एसपी और बाकी डीएसपी भी पीपीएस कैडर के ही हैं। यहां सिर्फ एक ही आइपीएस डॉ. वत्सला गुप्ता है, जो अभी अंडर ट्रेनिंग हैं और उन्हें बतौर एएसपी नकोदर सब डिवीजन के एएसपी का चार्ज दिया गया है। इसके अलावा यहां कोई आइपीएस अफसर तैनात नहीं है।

नेताओं की करीबी का फायदा

विभाग में इस बात की चर्चा है कि काबिलियत के अलावा ज्यादातर पीपीएस अफसरों की अच्छी कुर्सियों पर तैनाती में नेताओं से करीबी का फायदा मिल जाता है। चूंकि पीपीएस अफसर पंजाब में ही भर्ती होते हैं, इसलिए उनका लोकल लिंक आगे चलकर तरक्की के साथ काम आता रहता है। वहीं, आइपीएस अफसर यूपीएससी की परीक्षा के बाद चुने जाते हैं और कई आइपीएस अन्य राज्यों से भी हैं, जिसकी वजह से राजनीतिक पैरवी के तौर पर वो मात खा जाते हैं और उन्हें ऐसी फील्ड के बजाय दफ्तरी कामकाज तक सीमित कर दिया जाता है। हालांकि इतना जरूर है कि जो आइपीएस सीएम सिक्योरिटी में तैनात होते हैं, उनको जरूर जल्दी अच्छी कुर्सी मिल जाती है।

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