हर साल ऊंचे होते जालंधर के 'पहाड़', मेयर-कमिश्नर के लिए 'टूरिस्ट प्लेस'; हर साल फूंके जाते हैं करोड़ों रुपये
जालंधर के वरियाणा में कूड़े के पहाड़ तेजी से बढ़ रहे हैं, जिससे डेढ़ लाख लोग प्रभावित हैं और आसपास की कॉलोनियों में संपत्ति के दाम आधे हो गए हैं।
HighLights
वरियाणा में 50 साल से जमा हो रहा कूड़ा, पहाड़ बन गया।
बायोमाइनिंग प्रोजेक्ट 24 माह में केवल 12% ही पूरा हुआ।
लाखों लोगों के स्वास्थ्य और संपत्ति पर गंभीर असर।
जगजीत सिंह सुशांत, जालंधर। दुनिया में कोई पहाड़ इतनी तेजी से नहीं बढ़ता, जितनी तेजी से जालंधर में बढ़ रहे हैं। हो भी क्यों न, इसके पीछे नगर की 50 साल की मेहनत है। ये वरियाणा के कूड़े के पहाड़ हैं। इन पहाड़ों पर घूमना भी सस्ता नहीं है। साल में एक-दो बार सिर्फ मेयर, कमिश्नर या निगम के बड़े अफसर ही यहां आते हैं। इन्हें संभालने के लिए हर साल करोड़ों रुपए फूंक दिए जाते हैं।
इन कूड़े के पहाड़ों की कीमत चुका रहे हैं आसपास के डेढ़ लाख लोग। करीब 200 फुट ऊंचे हो चुके कूड़े के पहाड़ों के कारण यहां सांस लेना मुहाल है। आसपास की कॉलोनियों में प्रोपर्टी की कीमत आधी रह गई है। जमीन का पानी जहरीला हो रहा है। हर साल गांवों-मोहल्लों में बीमारी फैलती है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल, पाल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के आदेश भी बेअसर हैं।
बायोमाइनिंग प्रोजेक्ट फेल
वरियाणा डंप पर करीब 50 साल से जमा हो रहे कूड़े को खत्म करने का बायोमाइनिंग प्रोजेक्ट फेल हो गया है। डंप साइट पर 20 लाख टन कूड़ा है। इसमें से 7 लाख टन कूड़े को खत्म करने का प्रोजेक्ट तैयार किया गया था।
32 महीने में काम पूरा करना था लेकिन 24 महीने बीत जाने के बाद भी सिर्फ 12 प्रतिशत के हिसाब से 86 हजार मीट्रिक टन कूड़ा ही खत्म हुआ है। अब बचे हुए 8 महीने में 6.14 लाख टन कूड़ा खत्म कना है। जो की संभव नहीं है। यह प्रोजेक्ट 32 करोड़ का था और नगर निगम इसे स्मार्ट सिटी कंपनी के फंड से करवा रहा है।
प्रोजेक्ट के फैक्ट
- 2017 में योजना बनी, 2019-20 में 73 करोड़ रुपए से घटाकर 32 करोड़ का मॉडल बनाया गया।
- 6 सितंबर 2024 को मंत्री बलकार सिंह ने 32.32 करोड़ और 2.80 करोड़ रुपए की मशीनरी के नए प्रोजेक्ट का शिलान्यास किया।
- 32 महीने में 7 लाख टन कचरा खत्म करने का लक्ष्य
- डेडलाइन - मार्च-अप्रैल 2027।
मौजूदा ताजा स्थिति
- फरवरी 2026 तक सिर्फ 86 हजार टन प्रोसेस, लक्ष्य का 12% ही।
- 6.14 लाख टन बाकी, 88% काम पेंडिंग
- अब 7 महीने में बाकी काम करना संभव नहीं
- मशीनरी और स्टाफ कम
- हर साल वर्षा में 3 महीने काम बंद रहता है
- रोज नया कूड़ा डंप हो रहा है, पुराना पहाड़ जस का तस।
