जालंधर, जेएनएन। जालंधर में जल का प्रवेश तो इसके नाम से ही है। कभी यहा ठाठे मारता सागर हुआ करता था। धीरे-धीरे यह धरा सागर के जातक पुत्र दैत्यराज जलंधर का राज्य हो गई। उसके बाद जालंधर में बारह सरोवर विकसित किए गए थे। इसकी चर्चा कई धार्मिक ग्रंथों में आज भी मिलती है। श्री देवी तालाब को भारत के 108 पावन सरोवरों में स्थान प्राप्त है।

चीनी यात्री ह्वेनसांग के अलावा बहुत से पुरातत्वविदों जैसे एलेग्जेंडर कनिंघम ने जालंधर के बारह सरोवरों का जिक्र किया है। इन्हीं सरोवरों की उपस्थिति को देख बौद्ध धर्म का विशाल सम्मेलन जालंधर में हुआ था। कुछ सरोवरों के समीप बौद्ध विहार हुआ करते थे, इस पर पुख्ता जानकारी नहीं मिलती है। इन सरोवरों की उत्पत्ति का कारण वर्षा ऋतु नहीं। ये सरोवर धरती से स्वत: प्रकट हुए थे तो प्रश्न उठता है फिर गए कहां?

ऐसी मान्यता है कि जालंधर निवासियों ने वरुण देवता के वरदान को संभाल कर नहीं रखा या उस पवित्र जल को उचित सम्मान न दे सके, जिससे वह धरा में समा गया।

शहर का सबसे प्राचीन सरोवर है श्री देवी तालाब

श्री देवी तालाब को नगर का प्राचीनतम सरोवर माना जाता है। जब सती माता का एक अंग यहा गिरा, तब कथा के अनुसार भगवान शंकर के नेत्र से जो अश्रुधारा बही, वह इस सरोवर का रूप ले गई। एक अन्य कथा के अनुसार एक महान योगी त्रिपुरमालिनी के पावन स्थान पर विश्राम कर रहा था। उसे प्यास लगी। निकट कोई कुआं आदि दिखाई न दिया तो उसने इंद्रदेव का आह्वान किया और देखते ही देखते एक काली घटा छम-छम बरसने लगी और त्रिपुरमालिनी के चरणों में सरोवर बन गया।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार आदि जगतगुरु शकराचार्य जब जहा पधारे तो उन्होंने देवी त्रिपुरमालिनी के मंदिर का निर्माण कराया। तब उन्होंने गंगा मैया का आह्वान किया, जिससे देखते-देखते धरती से जल प्रकट हो गया। बाबा हेमगिरि से भी इस सरोवर के संबंध में कथाएं सुनने को मिलती हैं। इस सरोवर को चारों ओर से सीढिय़ा 19वीं शताब्दी के आरंभिक दशक में बनाई गई मानी जाती हैं। बाबा हरिवल्लभ यहां वर्षों तक संगीत साधना करते रहे। बाबा हेमगिरी के चमत्कारों की दास्तानें सुनने को मिलती हैं। यवन आक्रमणकारी इसे तबाह करते रहे। इसके किनारों पर बने प्राचीन मंदिरों को गिराते रहे, परंतु त्रिपुरमालिनी की कृपा से मंदिरों का पुर्ननिर्माण भी होता रहा।

देश विभाजन के बाद महान संत नारायण गिरि जी वर्ष 1952 में जालंधर पधारे और उन्होंने सीढिय़ों की मरम्मत करवाई। मंदिर के चारों तरफ छोटे-छोटे मंदिरों का निर्माण करवाया, जिनमें रात्रि के समय दीप प्रज्वलित किए जाते थे। इससे सरोवर की लहरों पर मनभावन दृश्य अठखेलिया करता दिखाई देता। संत नारायण गिरि जी ने तालाब के मध्य में 48 स्तंभ बनवाए, जिन पर मंदिर के निर्माण करने का संकल्प किया। वर्ष 1970 में तालाब की सीढिय़ा और मंदिर के निर्माण को आरंभ किया गया, जो आज भव्य स्वरूप लेकर अपनी शोभा बढ़ा रहा है।

प्रस्तुतिः दीपक जालंधरी (लेखक जालंधर के पुराने जानकार और स्तंभकार हैं)

 

 

 

 

हरियाणा की ताजा खबरें पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

पंजाब की ताजा खबरें पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

 

डाउनलोड करें जागरण एप और न्यूज़ जगत की सभी खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस

ਪੰਜਾਬੀ ਵਿਚ ਖ਼ਬਰਾਂ ਪੜ੍ਹਨ ਲਈ ਇੱਥੇ ਕਲਿੱਕ ਕਰੋ!