जगजीत सिंह सुशांत, जालंधर। दशहरा और दीवाली सिर पर हैं और फेस्टिवल सीजन में नगर निगम लोगों को स्वच्छ शहर मुहैया करवा पाने में विफल रहा है। कूड़ा प्रबंधन की ठोस योजना नहीं होने के कारण नगर निगम के लिए कूड़ा प्रबंधन आज सबसे बड़ी चुनौती बन गया। स्थित इतनी खराब है कि वरियाणा डंप पर फेंकने के लिए जगह नहीं बची है। नई जगह लेने के बारे में न सोचा गया और न इतनी आसानी से मिलेगी। नतीजा, वैध डंपों पर कूड़े के ढेर बढ़ते गए और अवैध डंपों की गिनती भी।

हाईवे के किनारे, चौक-चौराहों व खाली प्लाट में पड़े ढेरों की गिनती करें तो शहर में इनकी संख्या 500 से ज्यादा है। इससे स्वच्छता रैंकिंग हर साल गिरती जा रही है। दो दिन पहले जारी हुई स्वच्छता रैंकिंग में जालंधर देश के टाप 150 शहरों में भी जगह नहीं बना पाया। हर कोई कूड़े से त्रस्त है। परेशानी इस कदर बढ़ गई कि माडल टाउन के लोगों को एक सप्ताह तक दिन-रात धरना देना पड़ा। नगर निगम ने 45 दिन का समय मांगा धरना तो खत्म करवा लिया लेकिन समस्या ये है कि डंप का कूड़ा अब फेंका कहां जाएगा, क्योंकि वरियाणा का हाल तो हम सभी जानते हैं।

बदनुमा दाग बन गया है वरियाणा डंप

पिछले 40 साल में शहर का एकमात्र वरियाणा डंप एक बदनुमा दाग की तरह पहचान बन गया। कूड़े के इस पहाड़ की ऊंचाई 50 फीट से ज्यादा हो गई है। यह पहाड़ 16.5 एकड़ से भी ज्यादा जगह में है। पहले यह 14 एकड़ में था। जब कूड़ा फेंकने के लिए जगह खत्म हो गई तो निगम ने ढाई एकड़ जमीन और खरीदी। अब और जगह खरीदने के लिए जगह नहीं बची। इतनी जमीन पर चार क्रिकेट ग्राउंड या नौ फुटबाल ग्राउंड या फिर 13 हाकी ग्राउंड बन सकते हैं। निगम के आंकड़ों के मुताबिक इसका भार आठ लाख मीट्रिक टन से भी अधिक हो चुका है।

20 साल से कूड़े पर चल रही राजनीति

20 साल से कूड़े पर राजनीति चल रही है, लेकिन कूड़े को ठिकाने लगाने का इंतजाम आज तक नहीं हो पाया। कूड़े की सियासत करके परगट सिंह तीन बार कैंट हलके के विधायक बन चुके हैं। मेयर जगदीश राज राजा का भी यहां राज नहीं दिखाई देता। यहां कूड़ा ही सरताज है। कभी सबसे सुंदर शहरों में गिना जाता जालंधर किस तरह ‘कूड़ेदान’ बनता जा रहा है। 

नोटिफाइड डंप छोटे वरियाणा बनने लगे

जगह की किल्लत से मेन डंप पर कूड़ा फेंकना कम कर दिया। इससे शहर में नोटिफाइड डंप अब छोटे वरियाणा का रूप लेने लगे हैं। पहले कैंट क्षेत्र के नगर निगम की हद में आने वाले इलाके में 10 से ज्यादा डंप थे लेकिन अब अधिकांश इलाके का कूड़ा माडल टाउन डंप पर आ रहा है। पुराने शहर का कूड़ा प्रताप बाग और प्लाजा चौक के डंप पर आता है। यहां आसपास के इलाके से बुरी तरह प्रभावित हैं।

नगर निगम के नोटिफाइड डंप जरूर कम हुए हैं लेकिन गैर नोटिफाइड डंपों की गिनती कई गुना बढ़ गई है। नेशनल हाईवे के आसपास कूड़ा फेंका कजा रहा है। शहर के बाहरी इलाकों में बनी नई कालोनियों में तो खुले प्लाट और खाली पड़ी जमीन डंप साइट बन गई है।

एक लाख की आबादी झेल रही बीमारियां, प्रापर्टी के दाम गिरे

वरियाणा डंप के आसपास बसी कालोनियों, गांव के लोग बीमारियां झेल रहे हैं। यहां की न सिर्फ हवा जहरीली हो गई है बल्कि जमीन के नीचे का पानी भी दूषित हो गया है। कालोनियों में दूषित पानी की सप्लाई की वजह बीमार होने वालों का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है। डंपसाइट पर यह इंतजाम रखना होता है कि कूड़े से निकलने वाला गंदा पानी जमीन के नीचे न जाए और इसके लिए डंप पर कूड़ा फेंकने से पहले एक शीट बिछाई जाती है।

सीवरेज सिस्टम से गंदे पानी की निकासी करनी चाहिए लेकिन वरियाणा डंप पर ऐसा कोई इंतजाम नहीं है। डंप के निकट की कालोनियों के लोगों में चमड़ी रोग काफी है। शाम के बाद जब आक्सीजन लेवल कम होता है तो बदबू तेजी से फैलती है।डंप से जमीन में जा रहा गंदा पानी ही जमीन को खराब कर रहा है। कई किसान इससे प्रभावित हुए हैं। लोगों की प्रापर्टी के दाम गिर चुके हैं।

एक-एक करके फेल होते गए निगम के प्रोजेक्ट

वेस्ट मैनेजमेंट के लिए पिछले 20 साल में ने जितने भी प्रोजेक्ट बनाए या कोशिश की थे, वह सभी नाकाम रहे। ग्रो मोर कंपनी 18 साल पहले वरियाणा डंप पर कूड़े से खाद बनाने का प्रोजेक्ट शुरू किया था। शुरू में प्रोजेक्ट अच्छा चला। यहां से बनने वाली खाद की डिमांड भी रही लेकिन धीरे-धीरे यह प्रोजेक्ट फेल हो गया। निगम खाद को पीएयू लुधियाना से पंजीकृत नहीं करवा पाया। इसे हिमाचल प्रदेश में भी नहीं बेच पाया। कंपनी चली गई। कंपनी की मशीनरी भी कूड़े के नीचे दब चुकी है।

वेस्ट टू एनर्जी प्रोजेक्ट में उल्टा कोर्ट जाना पड़ा 

ग्रो मोर के बाद 13 साल पहले जमशेर में वेस्ट टू एनर्जी प्रोजेक्ट के तहत कूड़े से बिजली और गैस बनाने के प्रोजेक्ट पर काम शुरू किया। जिंदल इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी को हायर किया। कंपनी कामर्शियल यूनिट से कूड़ा इकट्ठा करने लगी। जमशेर में प्लांट लगाया जाना था लेकिन कूड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया। अकाली-भाजपा सरकार को यह प्रोजेक्ट रद करना पड़ा। कैंट में इसी मुद्दे को लेकर विधायक परगट सिंह ने अपनी ही पार्टी अकाली दल का विरोध किया और वे दोबारा विधायक बन गए। जिंदल कंपनी ने कोर्ट में केस कर रखा है।

वार्ड स्तर की प्लानिंग विफल

वरियाणा पर और कूड़ा न जाए इसके बाद निगम ने तय किया कि चारों विस हलकों में छोटे-छोटे प्रोजेक्ट लगाए जाएंगे। यह प्रोजेक्ट भी कागजों में रह गया। विधायक और पार्षद इसे लेकर सहमत नहीं हुए।

पिट्स भी हो चुके खराब

नगर निगम ने हर इलाके में पिट्स बनाने का काम शुरू किया। यह प्रोजेक्ट सस्ता और अच्छा है लेकिन इस पर भी काम नहीं हो पा रहा है। जहां जहां पिट्स प्रोजेक्ट बने हैं वहां स्टाफ नहीं मिला। नतीजा, पिट्स खराब हो चुके हैं। इसके लिए जरूरी है कि डोर टू डोर कलेक्शन के तहत गीला-सूखा कूड़ा अलग-अलग लें। तीन साल में कई बार जोर लगाया पर जन सहयोग नहीं मिल रहा।

आखिरी उम्मीद - 41 करोड़ का बायोमाइनिंग प्रोजेक्ट

बार बार नोटिस के बाद कंपनी तो जागी पर काम शुरू नहीं हुआ वरियाणा के पहाड़ को खत्म करने के लिए निगम ने स्मार्ट सिटी के फंड से 41 करोड़ का बायोमाइनिंग प्रोजेक्ट तैयार किया है। यह प्रोजेक्ट मई में शुरू होना था लेकिन मशीनरी भी नहीं लग पाई। कंपनी प्रोजेक्ट से भाग रही थी। निगम ने बार-बार नोटिस दिए। चेतावनी दी। अब कंपनी मान गई है और कंपनी ने अभी ट्रायल के रूप में दो छोटी मशीनें लगाई हैं। अगर यहां पर फुल मशीनरी के साथ काम किया जाए तो भी खत्म करने में चार साल लग जाएंगे। इससे पुराना कूड़ा तो खत्म किया जा सकता है लेकिन नए की प्रोसेसिंग भी करनी होगी।

पार्षदों की भी सुनिए

डंप साइट ही खत्म की जाए

वरियाणा डंप से सटे इलाके वार्ड 78 के पार्षद जगदीश समराय का कहना है कि डंप की वजह से लोग बीमार हुए हैं। आसपास के इलाके में जमीन के नीचे का पानी जहरीला हो चुका है। स्मार्ट सिटी कंपनी का पहला प्रोजेक्ट करीब 70 करोड़ का बनाया गया था। जब उन्होंने एतराज किया तो उसे 40 करोड़ का किया गया है। यह प्रोजेक्ट भी महंगा है लेकिन लोगों की जरूरत को देखते हुए इस काम में कोई रुकावट नहीं डालेंगे।

लोगों को मुआवजा भी मिले

वार्ड 76 के पार्षद लखबीर सिंह बाजवा ने कहा कि जमीनों के रेट गिर चुके हैं। बरसात के समय में लोग पेट का और चमड़ी रोग से पीड़ित होते हैं। कूड़ा फेंकने के लिए आने वाली गाड़ियां भी परेशानी का कारण बनती हैं और दुर्घटनाओं का खतरा भी बना रहता है। बाजवा ने कहा कि अगर डंप का कूड़ा खत्म हो जाता है तो यहां की जमीन पर खेलों से संबंधित कोई नया प्रोजेक्ट लाया जाना चाहिए। जो लोग डंप के कारण बर्बाद हुए हैं उन्हें मुआवजा मिलना चाहिए।

एक्सपर्ट व्यू - पांच समाधान तत्काल

  • रोज निकल रहे कूड़े को गीला और सूखा अलग करने के लिए लोगों को तैयार करें।
  • घरों से गीला कूड़ा अलग लेकर इसे पिट्स में डाल खाद बनाएं। और पिट्स बनाएं।
  • बड़े संस्थानों से निकलने वाले कूड़े को उन्हीं के परिसरों में खाद में बदलने को प्रेरित करें।
  • डंप पर जमा पुराने कूड़े को खत्म करने के लिए बायोमाइनिंग प्रोजेक्ट में तेजी लाना।
  • सड़कों के किनारे डंप खाली करवाना। डंप नहीं दिखेंगे तो लोग भी जागरूक होंगे।

नहीं बनी बात - 20 साल में 17 कमिश्नर आए व गए...

20 साल में सबसे ज्यादा हालात खराब हुए। शहर को चार मेयर मिले और 17 नगर निगम कमिश्नर तैनात रहे लेकिन एक भी मेयर या कमिश्नर इस समस्या का समाधान नहीं कर पाया। जो बड़े प्रोजेक्ट आए वह किसी न किसी वजह से राजनीति की भेंट चढ़ गए। निगम कमिश्नर भी अपने स्तर पर कोई प्रयास करने की वजह इन प्रोजेक्टों के बर्बाद होने का तमाशा देखते रहे।

साल 2002 से 2007 तक सुरिंदर महे, 2007 से 2012 तक राकेश राठौर, 2012 से 2017 तक सुनील ज्योति और 2017 से अब तक मेयर जगदीश राज राजा के पास लोगों को समाधान देने की जिम्मेदारी थी लेकिन इस पर कोई भी खरा नहीं उतरा। इन चारों मेयरों के कार्यकाल के दौरान 17 निगम कमिश्नर जालंधर में तैनात रहे।

साल 2002 से लेकर अब तक निगम कमिश्नर के तौर पर जगजीत सिंह, सरोजनी गौतम शारदा, टीआर सारंगल, सतवंत सिंह जोहल, सीएस तलवार, विनय बुबलानी, बीएस धालीवाल, मनप्रीत सिंह छतवाल, गुरप्रीत सिंह खैरा, बसंत गर्ग, दीपर्व लाकड़ा, करनेश शर्मा, दीपशिखा शर्मा और वर्तमान कमिश्नर दविंदर सिंह के रूप में 17 आयुक्त मिले हैं। सतवंत सिंह जोहल, सीएस तलवार और विनय बुबलानी को यह जिम्मेदारी दो-दो बार मिली है लेकिन कूड़े का हल नहीं निकल पाया।

निगम की नीयत में खोट

पलटा कूड़ा प्रबंधन पर कई सालों से काम कर रहे उद्योगपति अजय पलटा का कहना है कि उन्होंने लंबी रिसर्च के बाद कई मशीनें तैयार की है, जो देश के अलग-अलग इलाकों में काम कर रही हैं। उनका रिजल्ट बेहतरीन है लेकिन हैरानीजनक है कि नगर निगम ने आज तक इन मशीनों का डेमो तक नहीं लिया। कई बार प्रस्ताव भी दिया गया लेकिन निगम इस पर गंभीर नजर नहीं आया। अगर 10 से 15 साल पहले ही इन मशीनों का इस्तेमाल शुरू हो जाता तो कूड़े की समस्या खत्म हो गई होती। निगम की न तो नीयत ठीक नजर आई है और ना ही किसी मेयरों और अधिकारियों ने शहर के हित का सोचा।

दौरों के बहाने से सैर सपाटा

नगर निगम अफसरों ने वेस्ट मैनेजमेंट को लेकर देश में कई शहरों के दौरे किए हैं। जहां पर अच्छा काम हो रहा है वहां का काम देखने के बहाने अफसर सरकारी खर्च पर कई बार गए पर कोई भी प्रोजेक्ट जालंधर में लागू नहीं किया। यह दौरे सिर्फ सैर सपाटा बन कर रह गए।

Edited By: Pankaj Dwivedi

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