जालंधर, जेएनएन। महान अंग्रेज इतिहासकार अलैग्जेंडर कनिघंम ने जालंधर में आकर कई प्राचीन सूत्रों को जोडऩे का प्रयास किया, परंतु वह लंबे समय तक यहां नहीं रहे। इसलिए वह बहुत थोड़ा काम ही कर सके। जालंधर के इतिहास में कई ऐसे अवशेष आज भी उपलब्ध हैं, जिन पर शीघ्र कार्य करने की जरूरत है। दुनिया के प्राचीनतम नगरों में से जालंधर भी एक है। 

नगर को आक्रमणकारियों और लुटेरों से बचाने के लिए साढ़े पांच किलोमीटर दीवार के घेरे में बसे नगर निवासियों की सुरक्षा हेतु एक दुर्ग जैसा वातावरण उपलब्ध कराया गया था। यानी इस नगर के चारों ओर एक 10-12 फीट ऊंची दीवार का निर्माण हुआ। आज उस दीवार के अवशेष शायद न मिलें, परंतु आज से 30-40 वर्ष पूर्व दीवार के चिन्ह उपलब्ध थे। नगर के चारों ओर बनी दीवार में शहर के अंदर जाने के लिए अलग-अलग दिशाओं में 12 गेट बनाऐ गए थे, जो शहर की सुरक्षा को मजबूती प्रदान करते थे। जानते हैं इन गेटों की प्राचीनता के बारे में।

वर्तमान में जालंधर का माई हीरां गेट बाजार कुछ इस तरह नजर आता है।

माई हीरां गेट

पहले पूरे नगर के लिए मात्र एक ही प्रवेश द्वार था, जिसे भैरों गेट कहा जाता था। भगवती त्रिपुरमालिनी, जिन्हें नगर की रक्षा करने वाली देवी माना जाता था, उनके समीप भगवान शंकर ने भैरों की स्थापना की थी, जिसे भीषण भैरों कहा जाता था। श्रीमद् देवी भागवत के अनुसार भगवान शंकर के कंधे से अर्धजले माता सती के अंग-प्रत्यंग भगवान विष्णु के चक्र से कट कर संसार के कई भागों में गिरे। उनमें से एक जालंधर की पावन धरती पर भी आकर स्थापित हुआ। उस समय भगवान शंकर ने कहा था कि जहां-जहां माता सती भगवती स्वरूप में कामना पूरी करने और जन-जन के कल्याण हेतु निवास करेगी, उनके समीप भैरों भी होगा।

इसी गेट से नगर निवासी प्रातः काल देवी त्रिपुरमालिनी की पूजा-अर्चना के लिए जाते थे। पहले पहल इसे भैरव गेट कहा जाता था। महाराजा कपूरथला ने अपनी महारानी हीरा बाई के लिए बिक्रमपुरा में महल बनवाया। जब हीरा बाई आकर वहां रहने लगीं, तभी से इस गेट का नाम माई हीरां यानि हीरा माता के नाम से पुुकारा जाने लगा। जालंधर नगर के सेठों ने इस गेट के भीतर मंदिर का निर्माण करवा दिया था। कहा जाता है कि महारानी हीरा बाई इंस मंदिर में पूजा करने भी आया करती थीं।

इसके निर्माण में चूना, ईंटों का पीसा हु्आ पाउडर, जिसे सुरखी कहा जाता है और उड़द की दाल को मिला कर बनी नानकशाही ईंटों का प्रयोग से किया गया था। सन 1964 की वर्षा ऋतु में यह गेट थोड़ा गिर गया था। इस गेट से एक रास्ता भैरों बाजार से होता हुआ जालंधर नगर के सभी बाजारों को जाता है। भैरों मंदिर होने के कारण ही इस बाजार का नाम भैरों बाजार प्रसिद्ध हुआ। इसकी ऊचांई 16 फीट और चौड़ाई 12 फीट हुआ करती थी।

(प्रस्तुतिः दीपक जालंधरी - लेखक जालंधर के पुराने जानकार और स्तंभकार हैं)

Posted By: Pankaj Dwivedi

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