जेएनएन, जालंधर। केंद्र सरकार पाकिस्तान से सटी अंतरराष्ट्रीय सीमा तक श्री करतारपुर साहिब गलियारे का निर्माण करने का फैसला किया है। यह गलियारा पंजाब के गुरदासपुर जिले में डेरा बाबा नानक से शुरू होगा और भारत में स्थित अंतरराष्ट्रीय सीमा पर समाप्त होगा। सीमा से गुरुद्वारा महज चार किमी की दूरी पर स्थित है। पाकिस्तान में स्थित गलियारे के हिस्से को तैयार करने के लिए पड़ोसी देश ने भी सकारात्मक संकेत दिए हैं। इससे सिख संगत उत्साहित है। आखिर उनकी वर्षों पुरानी मांग पूरी हो रही है।

एतिहासिक महत्व

यहां गुरु नानक देव जी ने सिख समुदाय को एकजुट किया और 1539 में ज्योति जोत समाने तक 18 साल बिताए थे। भारत- पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा से गुरुद्वारा साफ दिखाई देता है। गुरु नानकजयंती के अवसर पर बड़ी संख्या में भारतीय सिख डेरा बाबा नानक गुरुद्वारा में एकजुट होते हैं और वहां स्थापित दूरबीन की मदद से पवित्र गुरुद्वारा दरबार साहिब करतारपुर के दर्शन करते हैं।

दूरबीन से पाकिस्तान स्थित करतारपुर साहिब के दर्शन करता श्रद्धालु।

जटिल मसला

अगर गलियारा बनता है तो पाकिस्तान की पहुंच भारतीय सीमा के बेहद करीब हो जाएगी। पूर्व में ऐसी बातें भी आ चुकी हैं कि पाकिस्तान अपने यहां खालिस्तान आंदोलन को हवा देता रहा है। पाकिस्तान की नीयत कभी भी साफ नहीं रही है, इसीलिए भारतीय अधिकारियों का यह शक बेवजह नहीं है कि इस गलियारे का पाकिस्तान दुरुपयोग कर सकता है।

चार मौकों पर करते हैं यात्रा

भारत से सिख जत्थे हर साल चार मौकों पर पाकिस्तान की यात्रा करते हैं। बैसाखी, गुरु अर्जुन देव के शहीदी दिवस पर, महाराजा रणजीत सिंह की पुण्यतिथि पर और गुरु नानक देव जयंती पर। इन भारतीय तीर्थयात्रियों को पाकिस्तान में सभी गुरुद्वारों के दर्शन करने की अनुमति होती है।

पाकिस्तान स्थित करतारपुर साहिब।

वर्षों से हो रही थी मांग

शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति और राजनीतिक नेताओं से लंबे समय से एक ऐसे गलियारे के निर्माण की मांग की जा रही थी जिसके दोनों तरफ कंटीले तार लगे हों। इस गलियारे से होते हुए तीर्थयात्री पाकिस्तान स्थित श्री करतारपुर साहिब पहुंच सकें और उसी दिन वापस आ सकें। इसके लिए बीच में पड़ने वाली रावी नदी पर पुल बनाना पड़ेगा। इसके बाद गुरुद्वारा जाने के लिए किसी पासपोर्ट या वीजा की जरूरत नहीं होगी। हाल ही में यह मांग संसद की स्थायी समिति के सामने भी रखी गई जो पिछले साल डेरा बाबा नानक शाह गई थी।

अटल जी ने की थी पहल

1999 में मरम्मत और पुनर्निर्माण के बाद तीर्थयात्रियों के लिए गुरुद्वारा खोला गया था। तब से सिख नियमित रूप से वहां दर्शन कर रहे हैं। फरवरी 1999 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने जब एतिहासिक लाहौर बस यात्रा की थी, उसी दौरान उन्होंने इस मसले को उठाया था। उसके बाद ही भारतीय सिखों को यहां दर्शन की सुविधा दी गई। मान्यता प्राप्त वीजा के साथ तीर्थयात्री के पाकिस्तान में प्रवेश करने के बाद गुरुद्वारा श्री करतारपुर साहिब जाने पर कोई प्रतिबंध नहीं है।

क्या है श्री करतारपुर साहिब गुरुद्वारा

गुरुद्वारा करतारपुर साहिब सिख धर्म का सबसे पहला धार्मिक स्थान है। यहां गुरु साहिब ने खुद एक मोहड़ी गाड़ कर श्री करतापुर साहिब गुरुद्वारा की नींव 13 माघ संवत 1522 को रखी थी। आइए जानते हैं क्या हैं यहां की खास बातें।



ऐतिहासिक कुएं

गुरुद्वारा परिसर में तीन कुएं हैं। एक कुआं अंदर है। माना जाता है कि ये कुआं गुरुनानक देव जी के समय से है। इस कारण कुएं को लेकर श्रद्धालुओं में काफी मान्यता है। कुएं के पास एक बम के टुकड़े को भी शीशे में सहेज कर रखा गया है। कहा जाता है कि 1971 की लड़ाई में ये बम कुएं के अंदर गिरा था। इस वजह से यह इलाका तबाह होने से बच गया।

पुनर्निर्माण

रावी नदी में आई बाढ़ के कारण गुरुद्वारे को काफी नुकसान पहुंचा था। उसके बाद 1920-1929 तक महाराजा पटियाला भूपिंद्र सिंह ने इसे फिर से बनवाया था। इस पर 1,35,600 का खर्च आया था।



दरबार साहिब

रुद्वारा श्री करतारपुर साहिब की दूसरी मंजिल पर स्थित है श्री दरबार साहिब, जहां पर श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी सुशोभित हैं।

समाधि

हिंदुओं और सिखों द्वारा बनाई गई श्री गुरु नानक देव जी की समाधि, जहां पर सिख व हिंदू श्रद्धालु नतमस्तक होते हैं।



दरगाह

करतारपुर में मुस्लिम समुदाय की ओर से बनाई गई श्री गुरुनानक देव जी की समाधि, जहां मुस्लिम करते हैं सजदा। यहां सेवा करने वालों में सिख और मुसलमान दोनों शामिल होते हैं। सिख जहां रुमाला साहिब बांध कर अंदर जाते हैं, तो मुस्लिम टोपी पहन कर दर्शन करते हैं।

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Posted By: Kamlesh Bhatt

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