जालंधर [इबलीस]। पंजाब समेत उत्तर भारत में लगातार बढ़ने वाले प्रदूषण को देखते हुए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT)  पराली जलाने पर पूर्ण पाबंदी लगा दी। इसके साथ ही 1500 रुपये से लेकर 15000 रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान भी किया। सेटेलाइट की मदद से खेतों की निगरानी भी शुरू की गई है। इससे पराली को आग लगाने की प्रक्रिया में कमी तो आई, परंतु इस पर काबू नहीं पाया जा सका।

पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (PPCB) की ओर से पिछले वर्षों के दौरान पराली जलाने पर जुर्माना भी लगाया गया लेकिन हालात वही ढाक के तीन पात पात वाले रहे। जुर्माना तो हुआ, लेकिन उसकी पूरी वसूली भी नहीं की जा सकी। उधर, कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने किसानों को वित्तीय दंड देने पर रोक लगा दी है। इस स्थिति में पराली को आग से बचाने की कवायद में जुटी सरकार, पीएयू और कृषि विभाग द्वारा जागरूकता के साथ-साथ पराली प्रबंधन के लिए मशीनरी पर सब्सिडी दी जा रही है।

दूसरी तरफ विशेषज्ञों की राय है कि इस दिशा में कुछ और कदम उठाए जाएं तो ही पराली प्रबंधन की राह आसान होगी। केवल मशीनरी पर सब्सिडी नाकाफी है, इसे लेकर सरकार को थोड़े और प्रयास करने होंगे। किसानों की आर्थिक स्थिति को भी मजबूत करने के लिए प्रयास करने होंगे और पराली प्रबंधन के लिए बायोमास प्लांट लगाने के अलावा कृषि लागत को कम करने के लिए प्रयास करने होंगे।

किसान को फसलों का सही समर्थन मूल्य मिले तो नहीं आएगी ऐसी नौबत

स्टेट अवार्डी किसान श्रवण सिंह चंदी का कहना है कि उन्होंने तीन साल से खेतों में पराली को आग नहीं लगाई। उनके पास पराली प्रबंधन के लिए नई मशीनरी उपलब्ध है, परंतु पंजाब में किसानी का एक दुखद पहलू यह भी है कि किसानों की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। किसान मिट्टी के साथ मिट्टी होकर देश का पेट भरता है, वह कभी नहीं चाहता कि पर्यावरण को नुकसान पहुंचे। पराली जलाने के पीछे किसानों की मजबूरियां और संसाधनों की कमी है, जिस पर सरकारें ध्यान नहीं दे रही।

सरकारी स्तर पर किसान को फसल की लागत का पूरा मूल्य भी नहीं मिल पाता। अगर किसानों को फसल का सही समर्थन मूल्य मिले, सरकारी मुलाजिमों की तरह महंगाई में फसलों का उच्च मूल्य मिले और स्वामीनाथन रिपोर्ट को लागू कर दिया जाए तो किसान की आर्थिक स्थिति सुधरेगी। लेकिन केंद्र सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य को नाममात्र बढ़ाकर किसानों के साथ मजाक करती आई है।

खेती में प्रयोग होने वाली मशीनरी, कीटनाशक दवा, खाद आदि सभी की कीमतें लगातार बढ़ी हैं। इस कारण फसल पर लागत मूल्य और मुनाफे में तालमेल ही नहीं बैठता, जिस कारण किसान मजबूरी में खेती लागत में कटौती करने के लिए पराली को आग लगा देता है। वित्तीय बोझ बढऩे के डर से किसान ऐसा कदम उठाते हैं। अगर उन्हें फसलों का सही मूल्य मिले तो उनकी आर्थिक स्थिति बेहतर होगी ही वह मशीनरी खरीदकर खुद ही पराली जलाने से मुंह मोड़ लेंगे।

ऊर्जा उत्पादन में पराली का हो सकता है बेहतर उपयोग

प्रदेश में पराली से ऊर्जा उत्पादन की तरफ और काम करने की जरूरत है। प्रदेश के कुछ जिलों में ऐसे प्लांट लगाए गए हैं, जहां पराली से ईंधन तैयार किया जा रहा है। कई जिले ऐसे हैं जहां अभी तक इस ओर कदम तक नहीं बढ़ाए गए। सरकार को इस दिशा में आगे बढ़ेन की जरूरत है। इस संबंध में कपूरथला के जिला प्रसार विशेषज्ञ डॉ. प्रदीप कुमार का कहना है कि पंजाब में पराली को आग लगाने का रुझान साल 1990 तक बहुत च्यादा था।

उन्होंने कहा कि केवल पराली ही नहीं बल्कि जमीन से निकलने वाले पानी के कारण गिरते भू-जल ने पंजाब की चिंताएं बढ़ा दी हैं। प्रदेश में 26 लाख हेक्टेयर धान के रकबे को घटाकर 16 लाख हेक्टेयर करने की जरुरत है। इससे पराली का उत्पादन कम होगा और साथ में भू-जल की स्थिति भी सुधरेगी। वहीं पंजाब ऊर्जा विकास एजेंसी (पेडा) ने 66.5 मेगावाट क्षमता के प्लांट लगाकर साल 2023 तक राच्य में 660 मैगावाट बिजली पैदा करने का लक्ष्य रखा है। फाजिल्का में लगे ऐसे ही एक प्लांट में पराली से कंपोस्ट के अलावा बिजली भी पैदा की जा रही है। एक लाख टन पराली से ढाई लाख किलोलीटर ऐथनोल पैदा की जा सकती है।

पंजाब में 20 लाख टन पराली होती है, इससे 50 लाख किलोलीटर ऐथनोल पैदा की जा सकती है। इसे मोटर गाड़ियोंं के ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। पंजाब सरकार के प्रयास जारी हैं और अलग-अलग तेल कंपनियों के साथ बायो सीएनजी पैदा करने के लिए करार किए गए हैं। वर्बियो इंडिया प्राइवेट लिमिटिड की ओर से संगरूर जिले में एक बायो सीएनजी प्लांट लगाया है, जहां 300 टन पराली से 33.23 टन सीएनजी रोजाना पैदा की जा रही है।

किसान खुद भी बचें अपना दोहरा नुकसान करने से

कृषि मामलों के लेखक दिनेश दमाथिया का कहना है कि पंजाब में हर साल पराली जलाने के करोडो़ं रुपये कीमत के 1.5 लाख टन पौषक तत्व नष्ट हो जाते हैं। इन तत्वों के खात्मे के बाद किसान फिर एक बार बाजार से खाद खरीद कर अपना खर्च बढ़ा लेता है। सीधे शब्दों में कहें तो पराली जलाकर किसान खुद का दोहरा नुकसान कर रहे हैं। ऐसा न करके किसान को जैविक खेती की ओर बढऩा पड़ेगा। फसलों के अवशेष खेतों में ही इस्तेमाल करना आज की जरूरत बन गया है। पराली से तैयार की गई कंपोस्ट खाद को खेती उत्पादन के लिए बेहद उत्तम माना गया है। घरेलू रसोई में पैदा होने वाले कचरे को भी केंचुओं की मदद से कंपोस्ट बना कर भी खेतों में इस्तेमाल किया जा सकता है।

हरियाणा की ताजा खबरें पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

पंजाब की ताजा खबरें पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

 

Posted By: Kamlesh Bhatt

डाउनलोड करें जागरण एप और न्यूज़ जगत की सभी खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस

ਪੰਜਾਬੀ ਵਿਚ ਖ਼ਬਰਾਂ ਪੜ੍ਹਨ ਲਈ ਇੱਥੇ ਕਲਿੱਕ ਕਰੋ!