दादा गूंथते हैं मिट्टी, पोता चलाता है चाक; जालंधर के सोफी पिंड में 3 पीढ़ियों से जिंदा है दीयों की विरासत
जालंधर के सोफी पिंड में कुम्हारों की तीसरी पीढ़ी मिट्टी के दीये बनाने की अपनी पारंपरिक कला को जीवित रखे हुए है।
-1793093368326_m.webp)
दादा ने थामा चाक, पोता दे रहा आकार, सोफी पिंड में जिंदा है विरासत।
HighLights
सोफी पिंड में कुम्हारों की तीसरी पीढ़ी दीये बना रही।
बाजार की मांग पर अब डिजाइनर दीये भी बन रहे।
दीयों का सीजन अब तीन महीने तक बढ़ गया है।
शाम सहगल, जालंधर। फेस्टिवल सीजन में जब शहर रोशनी से जगमगाता है, तो उस रोशनी के पीछे सोफी पिंड के उन कुम्हार परिवारों की मेहनत होती है, जिनकी तीसरी पीढ़ी आज भी चाक पर मिट्टी को आकार दे रही है। यहां दीया सिर्फ मिट्टी का बर्तन नहीं, बल्कि विरासत है। जिसे कोई दूसरी तो कोई तीसरी पीढ़ी संभाल रही है।
ऐसा नहीं है कि यह परिवार केवल मिट्टी के दीये ही बनाते है, कुछ अन्य कारोबार से जुड़ चुके परिवार यहां से शिफ्ट हो चुके है। जबकि कुछ यहीं पर रहकर फील्ड बदल रहे है। समय के साथ इन दीयों के निर्माण में बाजार की मांग ने बदलाव ला दिया है। इसके तहत पहले जहां केवल मिट्टी के दीये तैयार किए जाते थे, वहां पर अलग-अलग आकार के रंग-बिरंगे व स्टोन से लेकर गोटा वाले दीये तैयार किए जा रहे है। जो रोशनी के त्योहार को रंगीन भी करेंगे।
कैंट के सोफी गांव में अधिकतर परिवार इन दिनों मिट्टी के दीयों का निर्माण करके परिवार चलाते है। गांव के 72 वर्षीय कुलदीप राय बताते हैं कि यह काम अपने पिता कीमती लाल से सीखा था। उस समय हम बैलगाड़ी पर दीये बेचने जाते थे। आज उनका बेटा सुनील कुमार भी इसी काम में लगा है। वह बाहरवीं की पढ़ाई के साथ-साथ शाम को चाक पर बैठना नहीं भूलता।
सुनील ने कहा कि नौकरी की तलाश तो है, पर दादा की इस कला को खत्म नहीं होने देंगे। इसी तरह गांव के एक ही आंगन में तीन पीढ़ियां एक साथ काम करती नजर आती हैं। दादा मिट्टी गूंथता है, बेटा चाक चलाता है और पोता दीयों को भट्ठी में लगाने के लिए सुखाता है। बेटे रमेश कुमार बताते हैं कि दीपावली से कई दिन पूर्व ही आर्डर मिलने शुरू हो जाते है। सोफी पिंड जिले की सबसे बड़ी दीयों की मंडी है। जहां केवल जालंधर ही नहीं, बल्कि आसपास के जिलों से भी खरीदार आते हैं।
समय के सात बदला ट्रेंड
पहले लोग सिर्फ दिवाली पर ही दीये खरीदते थे। अब ट्रेंड बदल गया है। पहले 90 प्रतिशत लोग सादा दीया मांगते थे, अब 50 फीसद लोग डिजाइनर और रंगीन दीये की मांग करते है। इंटरनेट मीडिया और बाजार में आई नई वैरायटी देखकर ग्राहकों की पसंद बदली है, तो उन्हें भी खुद को बदलना पड़ा।
अब यहां दो रुपये पीस से लेकर 50 रुपये तक का दीया तैयार हो रहा है। दिवाली के लिए हठरी और करवे की डिमांड सबसे ज्यादा है। वहीं, गुरुपर्व के लिए बड़े आकार के दीये और न्यू ईयर के लिए सजावटी दीयों के आर्डर आ रहे है।
तीन महीने चलता है सीजन
वहीं, रमेश कुमार बताते हैं कि पहले दीयों का सीजन सिर्फ 15-20 दिन का होता था। अब यह बढ़कर तीन महीने का हो गया है। सितंबर में ही दिवाली की तैयारी शुरू होती है, जो नवंबर में गुरुपर्व व दिसंबर में क्रिसमस और न्यू ईयर तक चलती है। रंगाई और डिजाइन के लिए अब महिलाएं और युवा भी नए-नए आइडिया दे रहे हैं। यही वजह है कि कभी बंद होने की कगार पर पहुंचा यह काम, अब बाजार की मांग के साथ फिर से चमकने लगा है।
सरकारी मदद की दरकार
कारीगरों का कहना है कि मिट्टी महंगी हो गई है और मुनाफा कम रह गया है। ऐसे में प्रशासन और सरकार की तरफ से अगर मार्केट उपलब्ध करवाई जाए और चाइनीज लाइट्स की जगह मिट्टी के दीयों को बढ़ावा दिया जाए, तो उनकी यह तीसरी पीढ़ी भी इस विरासत को आगे ले जाती रहेगी।
