जागरण संवाददाता, जालंधर। जीतने का मजा तब आता है, जब सब आपके हारने की उम्मीद करते हैं.. ये डायलॉग उस फिल्म के कैरेक्टर हैं जिसने हाल ही में देश-विदेश में अपना डंका बजाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पार्टी लोकसभा चुनाव में बड़े अंतर से जीती है और देश के लोगों की जुबां पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम है।

इस बड़ी जीत के बाद शुक्रवार को उनकी बायोपिक पीएम नरेंद्र मोदी रिलीज हुई। हालांकि ये फिल्म चुनावों से पहले 12 अप्रैल को रिलीज होने होनी थी लेकिन चुनावों में विपक्ष के विरोध के चलते इसके रिलीज पर रोक लग गई थी। अब जब चुनाव नतीजे आ गए हैं और देश में पीएम मोदी का नाम छाया है, ऐसे मौके पर पीएम मोदी की बायोपिक रिलीज होने पर आशा जताई जा रही थी कि इसे दर्शक बहुत मात्रा में मिलेंगे, लेकिन ऐसा होता नहीं दिखाई दिया। हालांकि पीएम से जुड़े लोग और उनके फैन फिल्म देखने के लिए बेसब्र नजर आए। शहर में इसे केवल दो ही स्क्रीन मिल पाईं। दोपहर 12.45 और रात 11 बजे का शो पीएम नरेंद्र मोदी की फिल्म का नजर आया। हालांकि फिल्म को दर्शक भी कम मिले लेकिन जो दर्शक मिले वह फिल्म को लेकर उत्साहित नजर आए।

अपने पीएम को जानने का बेहतर मौका
नरेंद्र मोदी के बचपन से लेकर प्रधानमंत्री बनने तक की कहानी दिखाई गई है। इस फिल्म से बेहतर अपने पीएम को जानने का मौका और नही मिल सकता। कहानी की शुरुआत 2013 की बीजेपी की उस बैठक की है जिसमें नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित किया जाता है। फिल्म में विवेक ओबराय में नरेंद्र मोदी की छवि साफ नजर आती है। विशाल चुनावों में बड़ी जीत और उनके डायलॉग दोनों ने तालियां और सीटियां बजाने के लिए मजबूर कर दिया। बात फिल्म की करें तो इसमें लोकेशंस सबसे ज्यादा खूबसूरत हैं। खासकर हिमालय में फिल्माए गए दृश्यों की सिनेमेटॉग्राफी जबरदस्त है।फ्लैशबैक सीन में मोदी के पिता चाय की दुकान, मां घरों में बर्तन मांजती हुई नजर आई। इस फिल्म के जरिये उनका संघर्ष देखने को मिला है। फिल्म में मोदी की जिंदगी से जुड़े तमाम सवालों का जवाब देने की कोशिश की गई है। हालांकि नरेंद्र मोदी की बड़ी जीत के आगे ये फिल्म फीकी पड़ गई है लेकिन उनकी जिंदगी के कई अनछुए पहलु उनके फैन और समर्थकों के लिए बेहतरीन हैं।

विवादों से बचने के लिए किया गया ये काम

विवादों से बचने के लिए शुरुआत में लंबा-चौड़ा डिस्क्लेमर भी दिया गया है। इस फिल्म की कहानी का बहुत बड़ा हिस्सा भाषणों का है। डायलॉग्स कमाल के हैं। विक्रांत राय विवेक ओबेरॉय मोदी की छवि दिखाने में कामयाब हुए हैं। अमित शाह के किरदार में मोहन जोशी भी बेहतरीन हैं। जरीना वहाब और राजेंद्र गुप्ता के अलावा सह कलाकारों का अभिनय भी तारीफ के काबिल है। सिनेमेटोग्राफी शानदार है। फिल्म में मनोरंजन नहीं है लेकिन बोरियत भी बिल्कुल महसूस नहीं होगी। फिल्म की कहानी को पेश करने का तरीका और बेहतर हो सकता था और 2019 के चुनावों को भी शामिल किया जाना चाहिए था।  

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