अमृतसर [हरदीप रंधावा]। नवरात्र के नौवें दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा अर्चना होती है। मां सिद्धिदात्री नाम से ही स्पष्ट है, सब कुछ संतानों को देने वाली, समाज को देने वाली स्त्री। अपने अनुभव, ज्ञान, दर्शन से दिशा प्रदान करने वाली महिलाओं में मां के इस स्वरूप के दर्शन होते हैं। मां सिद्धिदात्री के स्वरूप से ही प्रेरणा लेकर डा. जीवन ज्योति सिडाना घर से लेकर संसार तक को सुंदर, जीवन से भरा व रहने योग्य बना रही हैं। बार्डर एरिया से संबंधित व आर्थिक तौर पर कमजोर वर्ग के बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ ज्योति उन्हें जीवन जीने के गुर सिखाती हैं। उनके मार्गदर्शन से आज बार्डर जिले से हजारों युवक-युवतियां देश व विदेश में ऊंचे मुकाम हासिल कर चुके हैं।

एलपीयू की फाउंडर प्रिंसिपल भी रह चुकी हैं डा. जीवन ज्योति

डा. जीवन ज्योति सिडाना ने बताया कि साल 1990 में जब खालसा कालेज में बतौर गणित विषय की अध्यापिका काम करती थीं, तो उनके मन में विचार आया है कि बार्डर जिला शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ा हुआ है़ जबकि अंतरराष्ट्रीय शिक्षा हासिल करने के लिए लोगों के पास आर्थिक मजबूती भी नहीं हैं। उनका दादका गांव जिला अमृतसर की तहसील अजनाला के गांव हर्षा छीना है। उन्हें अपने दादा अनंत राम पसरीचा और पिता बनारसी दास पसरीचा से भी प्रेरणा मिली थी, जिसके तहत उन्होंने समाज में दबे कुचले और आर्थिक तौर पर कमजोर वर्ग के लोगों की मदद करना जारी रखा है। उनके पति महिंद्रपाल सिडाना ने उनका मनोबल बढ़ाते हुए लगातार पढ़ाई जारी रखवाते हुए पीएचडी की डिग्री दिलाई। आज वह खुद अपना अपना अस्पताल व आधा दर्जन के करीब शैक्षणिक संस्थान चला रही हैं। यही नहीं डा. जीवन ज्योति सिडाना लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी (एलपीयू) की फाउंडर प्रिंसिपल भी रह चुकी हैं।

शिक्षा के क्षेत्र में आधा दर्जन संस्थाएं स्थापित कीं

अध्यापक माता पिता के घर में जन्मी डा. ज्योति ने ग्रामीण क्षेत्र में स्कूल की विद्या प्राप्त करके ग्रामीण लोगों की सेवा करने का संकल्प लिया था। शिक्षा के क्षेत्र में आधा दर्जन के करीब संस्थाएं स्थापित की, जिसके बाद निर्धन लोगों को स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान करने के मकसद से सिडाना मल्टी स्पेशिएलिटी अस्पताल का निर्माण किया। डा. सिडाना के मार्गदर्शन में एक बीएड कालेज, पालिटेक्निक कालेज, डिग्री कालेज चल रहा है।

अंतिम सांस तक समाज सेवा का ले रखा है संकल्प

डा. जीवन ज्योति सिडाना का कहना है कि बच्चों को सांसारिक शिक्षा ही नहीं बल्कि संस्कारी शिक्षा भी दी जाती है। इनमें से बहुत सारे बच्चे अच्छे-अच्छे पदों पर पहुंचकर सम्मानजनक जीवन व्यतीत कर रहे हैं। सामाजिक कार्यो के कारण इन्हें राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर अनेकों ही अवार्ड प्राप्त हो चुके हैं। उन्होंने अपनी अंतिम सांस तक समाज सेवा का संकल्प लिया है। दस से अधिक स्कालर्स का पीएचडी की डिग्री के लिए मार्गदर्शन कर चुकी हैं।

Edited By: Vinay Kumar