सुल्तानपुर लोधी [मनोज त्रिपाठी]। बाबा नानक के 550वें प्रकाश पर्व पर सुल्तानपुर लोधी आस्था के रंग में पूरी तरह सराबोर दिखा। आर नानक, पार नानक, हर द्वार नानक व उनकी शिक्षाओं की झलक यहां साफ दिखाई दी। शनिवार को हुआ समागम सियासत से पूरी तरह दूर रहा, जबकि श्रद्धा भरपूर दिखी। हजारों की संख्या में उमड़ी संगत किरत करो, वंड छको व नाम जपो के मूल मंत्र में डूबी रही। 13 किलोमीटर से ज्यादा क्षेत्र में फैले सुल्तानपुर लोधी में स्थित सभी आठ गुरुद्वारे, भारमल मंदिर, हजीरा, चिट्टी मस्जिद, काली बेईं, पीर गबगादी व पंज पीर में अगर कुछ दिखाई दिया, तो वह था बाबा नानक की शिक्षाओं का रंग।

सुबह के पांच बज रहे थे और कपूरथला से सुल्तानपुर लोधी जाने वाले मार्ग पर संगत से भरे वाहनों की संख्या लगातार बढ़ रही थी। रास्ते में संगत की सेवा के लिए लगे लंगर हॅाल से आ रही चाय व पकौड़ों की खुशबू भी श्रद्धा से भरी हुई थी। सड़कों पर सफाई कर रही संगत व ड्यूटी में मुस्तैद जवान श्रद्धालुओं के लिए हर स्थान पर उपलब्ध थे।

270 एकड़ में बनी टेंट सिटी के अलावा आसपास के गांव व कॉलोनियों में लोगों के घरों में रुकी संगत गुरुद्वारे में मत्था टेकने की तैयारी करने में जुटी थी। आर नानक, पार नानक, सब थां इक ओंकार नानक.. की गूंज संगत को मत्था टेकने के लिए गुरुद्वारे की तरफ खींच रही थी। आठ बजे तक जैसे-जैसे धूप खिल रही थी, वैसे-वैसे गुरुद्वारे के बाहर संगत की लाइन लंबी होती जा रही थी।

सुल्तानपुर लोधी से 400 किलोमीटर दूर स्थित देश की राजधानी दिल्ली से लेकर 87 किलोमीटर दूर स्थित लाहौर सहित दुनिया के कोने-कोने से आई संगत 'किरत करो, वंड छको व नाम जपो' का संदेश लेकर आगे बढ़ रही थी। कोई लंगर हॉल में बर्तन साफ करने की सेवा निभा रहा था तो कोई सड़क की सफाई, तो कोई प्रसादा वितरण में लगा था। बाबा नानक के दोनों मूल मंत्रों को अपनाने के बाद बची लाखों की संगत श्रद्धा भाव में डूबकर नाम जपने में लगी थी। दोपहर तक संगत से भरे लंगर हॉल, गुरुद्वारे और खचाखच भरी सड़कें प्रकाशोत्सव की शान बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही थीं।

प्रदर्शनियों के जरिए 11वीं शताब्दी से लेकर आज तक के इतिहास को सीने में समेटे सुल्तानपुर लोधी को जानने के बाद लोग इसके अमीर इतिहास से रूबरू होकर खुद को गौरवान्वित समझ रहे थे। 11वीं शताब्दी में दिल्ली से लाहौर के बीच सबसे प्रमुख बौद्धिक व व्यापारिक केंद्र के रूप में स्थित सुल्तानपुर लोधी में भले आज 32 बाजार और 5500 दुकानें नहीं रहीं। अकबर का शाही बाग नहीं रहा। सूती कपड़ों व शॉलों और कागज बनाने का काम इतिहास के गर्त में खो चुका है। अब यहां कुछ है तो बाबा नानक व उनके संदेश और शिक्षाएं, जिनमें जीवन का मूल मंत्र छिपा है।

इक ओंकार का संदेश

शाम के छह बजे जब एक तरफ सूरज छिप रहा था और प्रदूषण की मार झेल रही काली बेईं में बह रहे साफ पानी पर पड़ रही रंगीन लाइटें संगत का भक्तिभाव और बढ़ा रही थीं। ऐतिहासिक बेर साहिब गुरुद्वारे के पास बेईं के किनारे 1739 में बना हजीरा (मकबरा) भी बाबा नानक की श्रद्धा में डूबकर संगत को इक ओंकार का संदेश पहुंचा रहा था।

बाबा नानक की शिक्षाओं को जन-जन तक पहुंचाने के लिए चल रहे लाइट एंड साउंड शो से होकर संगत अगले पड़ाव की तरफ से बढ़ रही थी, जितनी संगत अपने-अपने गंतव्य की तरफ बढ़ रही थी, तो उससे ज्यादा संगत सरकारी बसों व वाहनों से मत्था टेकने के लिए सुल्तानपुर लोधी की सड़कों पर लाई जा रही थी। शांति व नाम जपने के साथ चेहरे पर संतोष लेकर लौट रही संगत और मत्था टेकने के उत्साह में डूबी संगत का यह सिलसिला 12 नवंबर, प्रकाशोत्सव तक निरंतर जारी रहेगाा।

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Posted By: Kamlesh Bhatt

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