बठिंडा [ज्योति बबेरवाल]। कहते हैं कि कुछ करने का जज्बा हो तो कोई भी बाधा इंसान को मंजिल हासिल करने से रोक नहीं सकती। ऐसा ही कुछ कर दिखाया है सुमित सोनी ने। जिसकी कड़ी मेहनत और इरादे ने उसे सफलता दिलाई। उनकी कड़ी मेहनत और पक्के इरादे ने उसे लाचार नहीं होने दिया। मूक-बधिर जैसी बाधा सुमित की कमजोरी नहीं बल्कि सफलता का सर्वोच्च श्रेय साबित हुई। कड़ी मेहनत और सच्ची लगन से ग्रेजुएशन की पढ़ाई के साथ-साथ जूडो में पूरी दुनिया में देश का नाम रोशन किया। अब भी देश का नाम रोशन करने के लिए आल इंडिया स्पोट्र्स काउंसिल आफ द डेफ में जूडो चैंपियनशिप प्रतियोगिता खेलने फ्रांस जा रहा है। इसके अलावा वह पंजाब स्टेट डेफ जूडो में 12 बार गोल्ड मेडल हासिल कर चुका है।

वहीं, नेशनल डेफ गेम्स में सात बार मेडल जबकि इंटरनेशनल डेफ जूडो में दो बार मेडल हासिल कर चुका है। उन्होंने अपनी मेहनत से दिखा दिया है, अगर दिल में कुछ करने का हौसला हो तो, वो इंसान कभी भी लाचार नहीं हो सकता। अब सुमित अपने परिवार के साथ खुशी-खुशी रह रहा है।

अपने माता-पिता के साथ सुमित सोनी।

निमोनिया के कारण चली गई सुनने की शक्ति

वैसे सुमित का जन्म हनुमानगढ़ जिले का है। हालांकि वह काफी सालों से बठिंडा में रहकर जूडो में पंजाब का प्रतिनिधित्व कर रहा है। पिता संजीव सोनी ने बताया कि उनके 4 बच्चे हैं। उनका बेटा सुमित जब दो महीने का था, तो उसे निमोनिया हो गया था। जिस कारण उसकी सुनने की शक्ति चली गई। इसके बाद काफी डाक्टरों को दिखाया, लेकिन उसका इलाज नहीं हो पाया। इसलिए उसे मूक-बधिर स्कूल में दाखिला करवाकर ग्रेजुएशन करवाई। जब वह स्कूल में था तो उसे कुश्ती व जूडो खेलना पसंद था। वह कुश्ती में गोल्ड भी हासिल कर चुका है, लेकिन कुश्ती में काफी चोटें लगने के कारण सुमित को हमने कुश्ती खेलने से मना कर दिया।

इसके बाद उसने जूडो खेलना शुरू कर दिया। कई बार गोल्ड भी लाया। अब वह बठिंडा कैंट में सरकारी नौकरी भी कर रहा है। वह अपनी पत्नी व बेटी के साथ रहा है। अब उसका परिवार उससे बेहद खुश है क्योंकि सुमित मूक बाधिर होने के बावजूद भी अपनी जिंदगी में सफलता हासिल कर चुका है। अब वह इंडियन आर्म्स फोर्स सिविलियन में कार्य कर रहा है।

दूसरों से अलग है सुमित

कोच गुलशन कुमार ने बताया कि वह कई दिव्यांग बच्चों को कोचिंग दे रहे हैं, लेकिन सुमित सोनी उन सभी बच्चों में से अलग है। जब सुमित उनके पास आया था तो उसे भी बात करने में मुश्किल पेश आती थी। लेकिन धीर धीरे उसे समझना शुरू किया। जूडो में वह बहुत माहिर था। इसलिए वह इतने सालों में इतने मेडल हासिल कर चुका है।

Edited By: Vinay Kumar