जालंधर [वंदना वालिया बाली]। शहर का एक वर्ग जहां हिंदी बोलने में भी शर्म महसूस करता है वहीं विदेश में बसी जालंधर की एक बेटी अपनी मातृभाषा के प्रचार-प्रसार में जुटी है। डॉ. सुधा ओम ढींगरा के लेखन की ‘अमृतधारा’ जालंधर से उत्पन्न हो सात समंदर पार तक प्रवाहित हुई। उत्तरी अमेरिका के नॉर्थ कैरोलिना में बसी डॉ. सुधा ओम ढींगरा आज अपनी पुस्तकों व पत्रिकाओं के अलावा, ई-पत्रिकाओं, कवि सम्मेलन, नाटक मंचन आदि द्वारा वह विश्व भर के हिंदी साहित्यकारों से न केवल जुड़ी हुई हैं बल्कि हिंदी प्रचार-प्रसार में अहम भूमिका निभा रही हैं।

शुरूआती पढ़ाई घर पर करने के बावजूद की पीएचडी

जालंधर में जन्मी ने सुधा ने जीवन संघर्ष के बावजूद न केवल एक मुकाम हासिल किया बल्कि मातृभाषा की ध्वजवाहक बन विश्व में एक मिसाल कायम कर रही हैं। पोलियोग्रस्त होने के कारण उनकी शुरुआती पढ़ाई घर पर ही हुई। फिर, जालंधर के लायलपुर खालसा कालेज फार विमन से बी.ए.ऑनर्स की और डीएवी कालेज से 1978 में हिंदी में एमए। वर्ष 1982 में जब उनका विवाह वैज्ञानिक ओम ढींगरा से हुआ तब वह ‘रामायण’ विषय पर पीएच.डी. (हिंदी) कर रही थीं। इससे पहले वह पत्रकारिता में डिप्लोमा कर चुकी थीं और फिर कुछ पत्र-पत्रकिाओं, टीवी, रेडियो आदि पर काम भी। विवाह के बाद वह विदेश में जा बसी लेकिन जड़ें हमेशा मातृभूमि से जुड़ी रहीं। बाद में भारत लौट कर पीएचडी पूरी की।


पत्रिका की माला में पिरो रखा है कई साहित्यकारों को 

आज डा. सुधा ओम ढींगरा की 32 पुस्तकें छप चुकी हैं। इनके अलावा 65 अन्य में उनकी रचनाएं शामिल हैं। वह ‘विभोम स्वर’ तथा ‘शिवना साहित्यिकी’ नामक दो त्रैमासिक पत्रिकाओं का प्रकाशण भी करती हैं, जो आनलाइन भी उपलब्ध होती हैं। जिसमें विश्व भर से साहित्यकारों की रचनाएं छपती हैं। अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति से जुड़ी डा. सुधा ओम ढींगरा 1989 से नियमित रूप से वार्षिक हिंदी कवि सम्मेलन आयोजित करवाती हैं। इसकी शुरुआत इन्होंने हास्य कवि सम्मेलन से की थी, जिसके पहले ही आयोजन में काका हाथरसी को भारत से बुलवाया गया था। डा. सुधा बताती हैं कि शुरुआती दौर में इन आयोजनों में हिंदी भाषी लोगों को जुटाना मुश्किल हो जाता था लेकिन अब छोटे शहरों में भी शो हाउसफुल जाते हैं। हर साल कवि सम्मेलन को 22- 25 अलग-अलग शहरों में करवाया जाता है।

रामलीला का भी होता है हिंदी में मंचन

डा. सुधा ओम ढींगरा के प्रयासों से पिछले कुछ वर्षों से विदेश में हिंदी में रामलीला भी करवाई जा रही है। उनके अनुसार डीएवी कालेज जालंधर में ही यूथ फेस्टीवल्स के दौरान अभिनय में रूचि हुई थी और तब गोल्ड मेडल भी जीता था मैंने। उसके बाद जालंधर दूरदर्शन पर भी अनेक कार्यक्रम व नाटकों में भाग लिया। वही अनुभव को अब रामलीला निर्देशित करने में काम आ रहा है। बताती हैं कि पहले पहल घर पर ही एक हिंदी लर्निंग सेंटर शुरू किया था। तब कुछ लोगों ने भाषा सीखने में रुचि दिखाई थी लेकिन अब करीब 100 विद्यार्थी यहां हिंदी सीखने आते हैं।

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Posted By: Pankaj Dwivedi

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