जालंधर [मनोज त्रिपाठी]। देश के बंटवारे के बाद पाकिस्तान के स्यालकोट से विस्थापित होकर आए सैकड़ों परिवारों ने देश में खेल उद्योग की स्थापना में अग्रणी भूमिका निभाई थी। 1950 से लेकर 2000 तक जालंधर व मेरठ के खेल उद्योग ने अपने देश सहित दुनिया के 100 से ज्यादा देशों में भारतीय खेल उत्पादों को पहुंचा कर देश की शान बढ़ाई थी। इन्हीं में शामिल देश का क्रिकेट बैट उद्योग कश्मीर के जंगलात विभाग के कुछ अधिकारियों व नेताओं तथा कश्मीरी उद्योगपतियों के मिलीभगत के चलते 20 सालों से लुटने की कगार पर पहुंच गया।

1999 में कश्मीरी अधिकारियों व नेताओं तथा दलाल उद्योगपतियों की तरफ से कश्मीरी विलो को कश्मीर से बाहर ले जाने पर लगाए गए जुबानी प्रतिबंध के चलते जालंधर व मेरठ सहित देश के अन्य राज्यों में स्थित क्रिकेट बैट उद्योग की 800 से ज्यादा यूनिटें 20 सालों में बंद हो गईं। कुछ उद्योगपतियों ने जम्मू, श्रीनगर, कठुआ तथा सांबा में वहां के लोगों के साथ मिलकर वहीं पर उद्योग स्थापित कर लिए, लेकिन वह भी उनके तरस पर निर्भर हैं। हद तो यह है कि यह प्रतिबंध कभी औपचारिक नहीं था। 2001 व 2008 वसुंधरा राजे सिंधिया तथा उमर अब्दुला ने उद्योगपतियों की मांग पर विचार किया। प्रतिबंध हटाया गया, लेकिन केवल एक्सपोर्ट के लिए। एक साल बाद दोबारा कश्मीर की लॉबी ने एकजुट होकर कश्मीर विलो को कश्मीर से बाहर ले जाने पर मौखिक आदेशों से प्रतिबंध लगवा दिया। तब से लगातार देश का क्रिकेट बैट उद्योग तबाही की कगार पर पहुंचता गया।



कश्मीरी विलो पर प्रतिबंध से क्रिकेट बैट बनाने वाली जालंधर की करीब 500 यूनिट्स बंद हो चुकी हैं।

आज हालात यह हो चुके हैं देश के क्रिकेट बैट बनाने वाले दो प्रमुख शहरों जालंधर व मेरठ की 700 से ज्यादा इकाइयां बंद हो चुकी हैं। इनमें 500 से ज्यादा इकाइयां जालंधर की हैं, जो चल भी रही हैं वो बैट की बजाय बैट के हैंडिल लगाने का काम कर रही हैं। कश्मीर से सेमीफिनिश बैट मंगवा कर उन्हें फिनिश करके अपने ब्रांड का स्टीकर लगाकर उन्हें बाजार में बेच रही हैं। अब इन उद्योगपतियों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा जेएंडके में अनुच्छेद 370 व 35 ए के हटाए जाने के फैसले के बाद बड़ी उम्मीद जगी है कि इस तरफ भी सरकार ध्यान दे तो हमारा क्रिकेट बैट उद्योग फिर से छक्का मारने को तैयार है।

प्रतिबंध से किसे हुआ लाभ
कश्मीरी विलो पर प्रतिबंध लगाने से सबसे ज्यादा लाभ इंग्लैंड को हुआ। हमारी कंपनियों ने बाजार में टिके रहने के लिए इंग्लिश विलो के बैट बनाने शुरू कर दिए। जो पैसा कश्मीरी किसानों को जाना था वह पैसा इंग्लैंड जाने लगा। कश्मीर के किसानों को उतनी ही धनराशि मिल रही है जितनी पहले मिलती थी। इसके अलावा कश्मीर के जंगलात विभाग के अधिकारियों व कश्मीरी विलो के रैकेट में शामिल कुछ कश्मीरी उद्योगपतियों तथा नेताओं को सीधे तौर पर मोटा लाभ हुआ। दो दशक से इसकी मार बाकी उद्योग झेल रहा है।

किसान की वही स्थिति
कश्मीरी विलो 10 से 12 साल में तैयार हो जाती है। कमाई के चक्कर में किसान उसे ज्यादा से ज्यादा 12 साल में काट कर बेच देता है। क्रिकेट के बैट के एक पीस लकड़ी के रूप में उसे 20 से 25 रुपये मिलते हैं। किसानों से लकड़ी लेकर उसे सेमीफिनिश करके जालंधर व मेरठ भेजने वालों को 400 से लेकर 800 रुपये प्रति पीस मिलते हैं।

सरकार दे ध्यान : महाजन मेरठ के बीडीएम ब्रांड के बैट बनाने वाले राकेश महाजन कहते हैं कि सरकार को दो बातों पर ध्यान देना होगा। पहली बात कि कश्मीरी विलो से प्रतिबंध हटवाए दूसरा श्रीनगर में कश्मीर विलो के ज्यादा से ज्यादा पौधों को लगवाना चाहिए। इससे कश्मीरी किसानों को लाभ होगा। कश्मीर में क्रिकेट बैट उद्योग कभी स्थापित नहीं हो सकता है, क्योंकि वहां सात से 8 माह सर्दी रहती है। तापमान कम होता है। इसलिए विश्व स्तरीय बैट वहां की बजाय जालंधर या मेरठ में जहां उद्योग स्थापित हैं वहीं बनवाए जाएं।

अपनी यूनिट में क्रिकेट बैट बनाने के कारोबार पर बात करते हुए उद्योगपति अरविंद अबरोल।

उद्योग को दोबारा जिंदा करने के लिए जरूरी : अबरोल ग्रेनीकाल के बैट बनाने वाले उद्योगपति अरविंद अबरोल कहते हैं कि कश्मीरी विलो से प्रतिबंध हटाने के साथ सरकार को श्रीनगर में विलो की खेती पर जोर देना होगा। हमारा उद्योग सक्षम है। प्रतिबंध हटते ही दोबारा उद्योग को ऑक्सीजन मिलेगी और एक बार फिर हजारों करोड़ का उद्योग जो सैकड़ों करोड़ में सिमट चुका है वह लाखों करोड़ में पहुंच सकता है।


सरकारी प्रतिबंध तो एशवुड पर है : अश्वनी स्पो‌र्ट्स फोरम के महासचिव अश्वनी स्वरा कहते हैं कि प्रतिबंध तो एश वुड पर था। उसकी आड़ में कश्मीरी विलो पर भी मौखिक प्रतिबंध लगवा दिया गया। यह फायर विलो होती है। इस पर प्रतिबंध लगाया ही नहीं जा सकता है।



बैट उद्योग को बढ़ाने के लिए उद्योगपति अनुराग शर्मा प्रधानमंत्री मोदी से बहुत आस लगाए बैठे हैं।

उद्योग के लिए प्रतिबंध हटना जरूरी: अनुराग
एएनएम ब्रांड के बैट बनाने वाले अनुराग शर्मा कहते हैं कि क्रिकेट वैट उद्योग की नजरें अब प्रधानमंत्री पर टिकी हैं। अगर कश्मीरी विलो से प्रतिबंध हट जाता है तो निश्चित तौर पर जालंधर का बैट उद्योग फिर से प्रफुल्लित हो जाएगा।
 

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