मनीष शर्मा, जालंधर। पहले जीरो बैलेंस पर खाता खुलवा बाद में स्कीम को संशोधित कर न्यूनतम बैलेंस की शर्त लागू नहीं की जा सकती। ऐसा ही फैसला जिला उपभोक्ता फोरम ने चार्टेड अकाउंटेंट इंदरबीर अरोड़ा की शिकायत पर देते हुए आइडीबीआइ बैंक को न्यूनतम बैलेंस के बदले काटे गए चार्ज को लौटाने का आदेश दिए। इसके साथ ही परेशानी के बदले 25 हजार रुपये हर्जाना व सात हजार केस खर्च भी देने को कहा। बैंक को कुल 59,640 रुपये चुकाने के लिए एक महीने का वक्त दिया गया है। रुपये न देने की सूरत में फोरम को शिकायत करने की तारीख यानि 22 अप्रैल 2018 से रुपये देने तक 12 फीसदी ब्याज और देना पड़ेगा।

जीरो बैंलेस पर खाता खुलवा काटे चार्जेस
चार्टेड अकाउंटेंट (सीए) इंदरबीर सिंह अरोड़ा ने फोरम में शिकायत दी कि उन्होंने आइडीबीआइ बैंक में आइएस अरोड़ा एंड कंपनी चार्टेड अकाउंटेंट्स के नाम से साल 2004 में खाता खोला था। उस वक्त बैंक ने 'स्पेशल करंट अकाउंट फॉर चार्टेड अकाउंटेंट्स विद प्रीमियम फैसीलिटीज' स्कीम के तहत यह अकाउंट खोला था। इसमें न्यूनतम बैलेंस की जरूरत नहीं थी। इसके बाद अगस्त 2015 के आसपास बैंक ने मंथली एवरेज बैलेंस न होने पर 21 अगस्त को उनकी सहमति के बगैर पैसे काट लिए। उन्होंने विरोध जताया तो 26 अगस्त को ये वापस खाते में लौटा दिए गए। इसके बाद अगले महीने से यह चार्जेस काटने शुरू कर दिए गए। उन्होंने सात जनवरी 2016 से लेकर नौ फरवरी 2018 तक बैंक को पत्र लिखने के साथ ई-मेल भी भेजे। इसके बावजूद बैंक ने 31 मार्च 2018 तक उनके खाते से 27,640 रुपये काट लिए।

बैंक ने कहा, स्कीम संशोधित की
फोरम ने आइडीबीआइ की जवाहर नगर स्थित ब्रांच व मुंबई हैड ऑफिस को नोटिस निकालकर जवाब मांगा। उन्होंने संयुक्त जवाब देते हुए कहा कि शिकायतकर्ता का उनके बैंक में खाता है और जो भी चार्जेज लिए जाते हैं वो बैंक के बोर्ड मीटिंग में लिए फैसले के आधार पर होते हैं। चार्टेड अकाउंटेंट्स के लिए जो न्यूनतम बैलेंस की जरूरत न होने की जो स्कीम दी गई थी, उसे संशोधित कर दिया गया था और एक अगस्त 2015 से यह लागू हो गया था। इस बारे में सभी ग्राहकों को समय-समय पर जानकारी भी दी जाती है। अगर कोई न्यूनतम बैलेंस नहीं रखता तो फिर उनसे तय चार्जेज लिए जाते हैं। इस बारे में शिकायतकर्ता को एसएमएस व ई-मेल के जरिए सूचना दी गई थी। बैंक ने यह जरूर माना कि सीए इंदरबीर सिंह अरोड़ा ने साल 2004 में उनके यहां खाता खोला था।

लाइफ टाइम के लिए जीरो बैलेंस तो बदल नहीं सकते
जिला कंज्यूमर फोरम के प्रेजिडेंट करनैल सिंह और मेंबर ज्योत्सना ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद अपनी टिप्पणी दी। उन्होंने कहा कि इसमें विवाद का विषय सिर्फ इतना है कि बैंक ने एक अगस्त 2015 को जो स्कीम में संशोधन किया है वह शिकायतकर्ता के अकाउंट पर लागू होता है या नहीं। फोरम ने बैंक की तरफ से सीए इंदरबीर अरोड़ा को 17 अगस्त 2004 को जारी पत्र का हवाला देते हुए कहा कि इसके मुताबिक चार्टेड अकाउंटेंट को लाइफटाइम जीरो बैलेंस के साथ खाता खुलवाने की विशेष सुविधा दी गई थी। जब शिकायतकर्ता ने खाता खोला तो तब बैंक की तरफ से मंथली एवरेज बैलेंस की कोई शर्त नहीं रखी थी।

फोरम ने कहा कि अगर संशोधन को गौर से देखें तो यह एक जुलाई 2015 से सभी खाताधारकों पर लागू हुआ है। इससे यह कतई स्पष्ट नहीं होता कि यह आदेश पिछले खातों पर भी लागू होगा, बल्कि इसके मुताबिक इस तारीख के बाद के खातों पर न्यूनतम बैलेंस रखना जरूरी किया गया है। चूंकि संशोधन 2015 में हुआ और सीए का खाता 2004 में खुला है, इसलिए उन पर यह लागू नहीं होगा। इस संशोधन के जरिए शिकायतकर्ता के खाते से गलत तरीके से पैसे चार्ज किए गए। फोरम ने आइडीबीआइ बैंक को सीए अरोड़ा को उनके खाते से काटे 27,640 रुपये वापस करने के साथ परेशानी के बदले 25 हजार और केस खर्च के तौर पर सात हजार रुपये देने के आदेश दिए।
 

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