जागरण संवाददाता, जालंधर

कोरोना के कारण बीते लगभग एक वर्ष की अवधि के दौरान यात्री बसों का संचालन कभी बंद और सही ढंग से न होने एवं शैक्षणिक संस्थानों के खुल न पाने के चलते बस बाडी फैब्रिकेशन इंडस्ट्री लगभग तालाबंदी की कगार पर आ पहुंची है। सरकारी समेत निजी बस आपरेटर नई बसों की फेब्रिकेशन नहीं करवा रहे हैं। स्थिति की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि नई बसें बनाने वाले बस बाडी फैब्रिकेटर अब रिपेयर तक के काम की भी राह देखने लगे हैं, लेकिन रिपेयर का काम भी ज्यादा नहीं आ पा रहा है। खर्च निकल न पाने के चलते अब कई बस बाडी फेब्रिकेशन इकाइयों के संचालक काम बंद कर देने तक की सोचने लगे हैं। यही नहीं, बस बाडी फेब्रिकेशन इकाइयों को माल सप्लाई करने वाले व्यापारी भी आर्थिक संकट से घिरे हुए नजर आ रहे हैं।

जय माता चितपूर्णी कोच बिल्डर्स के संचालक एवं अपर इंडिया कोच बिल्डर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष विजय खुल्लर ने कहा कि निजी आपरेटरों को लाकडाउन की अवधि के दौरान हुए घाटे को देखते हुए बैंकों ने नई बसों के लिए ऋण ही नहीं दिया। पंजाब रोडवेज ने भी बीते एक वर्ष के दौरान नई बसें नहीं बनवाई। सरकार की तरफ से मिनी बस आपरेटरों को नए परमिट देने की घोषणा की गई, लेकिन मिनी बस आपरेटर भी परमिट होने के बावजूद ऋण उपलब्ध न होने के चलते नई बसें खरीद ही नहीं सके। इसी वजह से बस बाडी फैब्रिकेशन इंडस्ट्री बेहद खराब हालात से गुजर रही है और कई फैब्रिकेटर अब काम बंद कर देने तक की सोच रहे हैं। मुलाजिमों को वेतन देना हुआ मुश्किल : दविदर सिंह

अमर कोच बिल्डर्स के संचालक एवं अपर इंडिया कोच बिल्डर्स एसोसिएशन के महासचिव दविदर सिंह बिट्टू ने कहा कि बीते एक वर्ष की अवधि के दौरान बस बाडी फेब्रिकेशन व्यवसाय बेहद खराब दौर से निकल रहा है। प्रदेश भर में नई बसों की फेब्रिकेशन रुकी पड़ी है। ऐसे हालात में तो मुलाजिमों का वेतन देना भी एक चुनौती बन गया है। स्कूल बंद हैं। बसों का संचालन भी नहीं हो पा रहा है, जिस वजह से आपरेटर नई बसें बनाने की तो कोशिश भी नहीं कर रहे हैं। बस आपरेटर तो अपनी पुरानी बसों को ही नहीं चला रहे हैं। उनका खर्च निकल नहीं पा रहा है। इस कारण उन्हें भी काम नहीं मिल रहा है। एक वर्ष से नई बस के लिए सप्लाई नहीं किया ग्लास : परमिंदर सिंह

बस बाडी फेब्रिकेशन के लिए ग्लास सप्लाई करने वाले जसविदर ग्लास हाउस के संचालक परमिदर सिंह ने कहा कि बीते एक वर्ष में उन्होंने किसी नई बस के लिए ग्लास सप्लाई ही नहीं किया है। वजह यह है कि फैब्रिकेटर्स के पास नई बसें बनने के लिए ही नहीं आ रही हैं। बीच में कुछ महीनों के लिए जब कोरोना का प्रकोप कुछ कम हुआ था, तब इक्का-दुक्का बाहरी राज्यों की बसों की फेब्रिकेशन जरूर हुई थी। वह भी इतनी नहीं थी, जिससे खर्च निकल पाता अथवा पुराने घाटे को पूरा किया जा सकता। काम एक बार फिर से बंद पड़ा हुआ है और फेब्रिकेशन इकाइयां तालाबंदी की कगार पर हैं।