जालंधर, जेएनएन। अंग्रेज अपने महान लोगों को बहुत सम्मान देते हैं। वे अपने जांबाज शहीदों को हमेशा याद रखने का साधन जुटा लेते हैं। इन्हीं में से एक था ईस्ट इंडिया कंपनी का कमांडर-इन-चीफ जार्ज बर्ल्टन। वह बहुत दिलेर और सूझवान व्यक्ति था। उसने हिंदुस्तान के समुद्रों की रक्षा करने का बीड़ा उठा रखा था। वह सागर का ऐसा प्रहरी था कि सागर दस्यु हिंदुस्तान की ओर आने से घबराते थे। उस समय में समुद्री लुटेरे किसी भी जहाज को घेरकर लूट लिया करते थे। परंतु जब जार्ज बल्टर्न ने सागर में जहाजों की रक्षा का दायित्व संभाला, तब कई खूंखार दस्यु इसकी नीति से मौत को प्राप्त हुए।

वर्ष 1815 में जब जार्ज बर्ल्टन एक जहाज पर सवार होकर सागर में गश्त कर रहा था तो एक अमेरिकी जहाज से गलतफहमी में टकराव हो गया। दोनों तरफ से गोली सिक्का का प्रयोग हुआ। उसी युद्ध में जार्ज बल्टर्न वीरगति को प्राप्त हो गया। इस घटना के बाद अंग्रेजों की जल और थल सेना में प्रतिशोध की भावनाएं उफान पर थीं। इसे शांत करने के लिए जालंधर के एक विशाल बाग को बर्ल्टन पार्क का नाम दे दिया गया।

हालांकि कुछ इतिहासकार ऐसा नहीं मानते। उनके अनुसार जालंधर का एक कमिश्नर था बर्ल्टन। इस बाग को उस समय के कुछ धनवान लोगों ने धनराशि देकर सजाया-संवारा और इसे बर्ल्टन पार्क का नाम दे दिया। यह पार्क गांधी नगर और कबीर नगर के निकट स्थित है। आज यहां क्रिकेट स्टेडियम और एक हॉकी स्टेडियम है। इसे अब गांधी पार्क के नाम से भी पुकारा जाता है। इसका निर्माण अठारहवीं शताब्दी के पूर्व का माना जाता है। तब यह शाही बाग के नाम से जाना जाता था ।

अंगूरों वाले बाग के नाम से भी प्रसिद्ध था रानी बाग

इसके बारे में दो प्रकार की बातें सुनने को मिलती हैं। कुछ लोग कहते हैं कि यह बाग क्वीन विक्टोरिया को समर्पित करके बनाया गया था। कुछ बड़े-बूढ़े ऐसा नहीं मानते। उनके अनुसार यह बाग किसी बड़े सेठ ने अपनी पत्नी के पेड़-पौधों से लगाव को सामने रखकर बनाया था। इस बाग में पहले-पहल फूलों के भिन्न-भिन्न प्रकार के पौधे रोपे गए थे।

कुछ समय बाद अफगानिस्तान से लाए गए अंगूर के बीज अंकुरित किए गए। अंगूरों की बेलें खूब फली-फूलीं। कुछ लोग इसे अंगूरों का बाग भी कहने लगे थे। यह बाग पठानकोट की ओर जाने वाले मार्ग के निकट पड़ता था। रानी बाग के अंगूरों के गुच्छे व्यापारिक दृष्टि से नहीं लगे थे। रानी बाग के रसीले अंगूर उस समय के अंग्रेज अधिकारियों को तोहफों के तौर पर भेजे जाते रहे। अब इतिहास के पन्नों पर भी इसकी कोई छाप नहीं मिलती। यह बाग सड़क से दो ढाई फीट नीचे है और इसके साथ धोबी घाट नजर आता रहा।

पूर्व मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरों के नाम पर बना प्रताप बाग

वर्ष 1962 के चुनाव में जब स्वतंत्र पार्टी ने उत्तरी विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा था। तब एक सरोवर के दोनों ओर लोगों ने खड़े होकर स्वतंत्र पार्टी के लिए प्रचार करने आए सिने स्टार प्रेमनाथ को भाषण देते सुना। इस क्षेत्र के एक तरफ फगवाड़ा गेट और दूसरी तरफ मंडी फैटनगंज है। एक बड़े लंबे-चौड़े मैदान के बीच यह जलाशय बहुत मनोरम दृश्य प्रस्तुत करता था। सरदार प्रताप सिंह कैरों जब पंजाब के मुख्यमंत्री बने, तब उन्होंने पंजाब के पूर्व सैनिकों की एक सभा जालंधर में आयोजित की थी। इस आयोजन के लिए उन्हें यही स्थान उपयुक्त लगा। उस आयोजन के बाद सरकार और नगर सुधार न्यास ने इस मैदान में बाग बनाने का निर्णय लिया। इसका नाम रखा गया प्रताप बाग, जो सरदार प्रताप सिंह कैरों को समर्पित है। आज यह बहुत सुंदर बाग है। यह हरियाली और फूलों से भरा हुआ है।

देश विभाजन के बाद यह जालंधर का एकमात्र ही ऐसा बाग है, जो जनता के प्रयासों से बना। इसके बिल्कुल पीछे लाल द्वार मंदिर है, जहां ध्यानपुर के बाबा लाल दयाल जी के श्रद्धालु पूजा पाठ करने आते हैं। उसी के साथ एक हाल भी बना दिया गया है, जहां सामाजिक कार्यक्रम होते हैं।

Posted By: Pankaj Dwivedi

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