मनोज त्रिपाठी, जालंधर। Punjab Congress Pargat Singh मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के इस्तीफा देने के बाद जालंधर कांग्रेस के भी समीकरण बदलने तय हो गए हैं। साढ़े नौ साल से मंत्री बनने का सपना देख रहे कैंट हलके के विधायक व पूर्व ओलिंपियन परगट सिंह की लाटरी निकल सकती है। अलग बात है कि कैप्टन के जाने के बाद जालंधर में भी कांग्रेस दो गुटों में बंट सकती है या फिर कैप्टन के साथ जालंधर के कुछ कांग्रेस विधायक भविष्य में नई दिशा की सियासत के साथ जुड़ सकते हैं।

परगट सिंह को 2012 में शिरोमणि अकाली दल के प्रधान सुखबीर सिंह बादल सियासत में लेकर आए थे। उन्होंने जालंधर में कांग्रेस के लिए सबसे ज्यादा सुरक्षित सीट कैंट से परगट को चुनाव मैदान में उतारा था। परगट को उम्मीद थी कि सुखबीर बादल सरकार बनने के बाद उन्हें खेल मंत्री की कुर्सी सौंपेंगे, लेकिन परगट की ज्यादा महत्वाकांक्षा को देखते हुए सुखबीर ने उन्हें मंत्री नहीं बनाया था। नतीजतन 2017 के चुनाव से पहले परगट सिंह ने सुखबीर के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद करके भाजपा छोड़कर नई पार्टी की तलाश में जुटे नवजोत सिंह सिद्धू के साथ अपना सियासी भविष्य तलाशना शुरू कर दिया था। आम आदमी पार्टी में बात बनने के बाद भी सिद्धू के न जाने के चलते परगट ने सिद्धू के साथ ही कांग्रेस ज्वाइन करके कांग्रेस की टिकट से जालंधर कैंट से दूसरी बार चुनाव लड़ा था। कैप्टन इस सीट से अपने करीबी जगबीर सिंह बराड़ को उम्मीदवार बनाना चाहते थे, लेकिन परगट के चलते बराड़ को कैंट छोड़ना पड़ा था। परगट यह चुनाव भी 29124 वोटों से जीत गए, लेकिन कैप्टन ने उन्हें सिद्धू खेमे का होने के चलते मंत्री नहीं बनाया।

इसके चलते परगट सिंह लगातार कैप्टन का विरोध करते रहे। कई बार तो उन्होंने खुलेआम सरकार की नीतियों की भी जमकर आलोचना की, जिससे सरकार की किरकिरी हुई थी। परगट ने कैप्टन की मुश्किलें बढ़ी थीं। सिद्धू के पंजाब कांग्रेस का प्रधान बनने के बाद परगट सिंह को संगठन में महासचिव का ओहदा देकर सिद्धू ने उनका कद बढ़ा दिया था। कैप्टन विरोधी विधायकों के साथ सिद्धू के प्रधान बनने के बाद उनकी बैठकें करवाने का काम भी परगट ने किया था।

जालंधर में नार्थ हलके के विधायक बावा हैनरी सहित बाकी विधायकों के साथ सिद्धू की से¨टग परगट ने करवाने की कोशिशें की थीं। अब अगर सिद्धू मुख्यमंत्री बनते हैं तो परगट का मंत्री बनना तय है। अगर सिद्धू मुख्यमंत्री नहीं बनते हैं और नए बनने वाले मुख्यमंत्री या कांग्रेस आलाकमान ने सिद्धू की सिफारिशों पर गौर किया तो भी परगट का नाम मंत्री बनने वालों की पहली लिस्ट में होना तय माना जा रहा है।

इसके साथ ही आने वाले दिनों में कांग्रेस का दो गुटों में बंटना भी तय माना जा रहा है। प्रधान बनने के बाद सिद्धू ने अपने पहले आधिकारिक दौरे में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं व विधायकों के साथ बैठक की थी। इसमें उन्होंने कैप्टन खेमे के विधायक सुशील रिंकू की मूंछों पर यह कमेंट 'हुण मुंछा थल्ले हो गइयां ने' करके अपनी मंशा जता दी थी कि अब वह फिर से पावर में हैं। रिंकू ने सिद्धू के लोकल बाडी मंत्री बनने पर उनके द्वारा लिए गए फैसलों का खुलकर विरोध किया था। उसके बाद रिंकू कैप्टन की गुड बुक में आ गए थे। यही हाल सांसद चौधरी संतोख सिंह व शाहकोट के विधायक लाडी शेरोवालिया का भी है। इनके ऊपर भी कैप्टन का करीबी होने की मुहर लगी है।

सेंट्रल हलके के विधायक राजिंदर बेरी की भी मंत्रिमंडल में होने वाले फेरबदल में मंत्री बनाने को लेकर चर्चाएं चल रही थीं, लेकिन कैप्टन के जाने के बाद अब नए मंत्रिमंडल में उनका नंबर लगना मुश्किल लग रहा है। इसके चलते आने वाले समय में सांसद सहित तीनों ही पुराने दिग्गज कांग्रेस विधायक कैप्टन के साथ कांग्रेस को बांटकर भविष्य की सियासत पर नजरें जमा सकते हैं।

बावा हैनरी को भी मिल सकता है तोहफा

कांग्रेस के पूर्व मंत्री अवतार हैनरी के बेटे व नार्थ हलके के विधायक बावा हैनरी ने सिद्धू के पंजाब कांग्रेस का प्रधान बनने के बाद उनके जालंधर आगमन पर कई जगहों पर उनके रोड शो व जनसभाएं करवा कर स्वागत किया था। बावा हैनरी पहली बार विधायक बने हैं और युवा हैं। कैप्टन के साथ उनके पिता अवतार हैनरी के 2002 से 2007 में जब कैप्टन मुख्यमंत्री थे तो उसी समय से खराब संबंध चल रहे हैं। कैप्टन ने तीन बार चुनाव जीतने वाले हैनरी को पहले फेज में मंत्री नहीं बनाया था। हालांकि करीब दो साल बाद उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया था। 2017 के चुनाव में हैनरी के विदेशी नागरिकता के मुद्दे में फंसने के बाद कैप्टन ने इस सीट से उनके बेटे के बजाय किसी दूसरे को टिकट देने की सिफारिश की थी, लेकिन जोरदार विरोध व कांग्रेस की तत्कालीन पंजाब प्रभारी आशा कुमारी के दखलंदाजी के बाद बावा हैनरी को टिकट मिली थी। बावा हैनरी चुनाव 32291 वोटों से जीते थे। सिद्धू की चली तो बावा हैनरी को युवा होने के नाते मंत्रिमंडल में शामिल किया जा सकता है।

पहली बार जालंधर को मंत्रिमंडल में नहीं मिली थी जगह

सूबे में जब भी कांग्रेस की सरकार रही है, मंत्रिमंडल में तीन से चार मंत्री जालंधर से ही होते थे। यह पहला मौका था जब 2007 से 10 साल इंतजार के बाद सत्ता में आई कांग्रेस ने जालंधर से एक भी विधायक को मंत्री नहीं बनाया था। 2002 से 2007 के दौरान जालंधर से मोहिंदर सिंह केपी, अमरजीत सिंह समरा, अवतार हैनरी व गुरकंवल कौर को मंत्री बनाया गया था। इसलिए भी सभी की नजरें नए समीकरणों के बाद इस बात पर टिकी हैं कि जालंधर से किसे-किसे मंत्री बनाया जाएगा।