एक मजाक ने बदल दी 162 जरूरतमंद बेटियों की जिंदगी, 16 साल से निभा रहे सगे पिता का फर्ज; भावुक करने वाली है कहानी
जालंधर की गुग्गा पीर वेलफेयर सोसाइटी ने 16 वर्षों में 162 गरीब और बेसहारा बेटियों की शादी करवाई है। यह ...और पढ़ें
-1789318788496_m.webp)
बेटियों की शादी कराती सोसाइटी। फोटो सोशल मीडिया
HighLights
गुग्गा पीर वेलफेयर सोसाइटी 16 साल से कर रही समाज सेवा।
अब तक 162 गरीब और बेसहारा बेटियों का विवाह कराया।
संस्था सदस्य पिता और भाई की तरह निभाते हैं सभी रस्में।
शाम सहगल, जालंधर। कहते हैं कि एक छोटी सी बात कभी-कभी जीवन की बड़ी प्रेरणा बन जाती है। कुछ ऐसा ही कर दिखाया गुग्गा नवमी मेले के साथ धर्म का प्रचार करने वाली संस्था ने। कभी मेले में हंसी-ठिठोली में कही गई एक बात आज 162 गरीब और बेसहारा बेटियों के जीवन का सहारा बन गई है।
गुग्गा पीर वेलफेयर सोसाइटी के नाम से संचालित यह संस्था आज उन बेटियों के लिए सगे बाबुल से भी बढ़कर है, जिनके सिर से पिता का साया उठ चुका है या आर्थिक तंगी जिनके विवाह में बाधा बनी हुई थी। पिछले 16 वर्षों से यह संस्था बिना किसी आडंबर के, पूरी सादगी और धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ जरूरतमंद बेटियों के हाथ पीले करवा रही है। अब तक 162 बेटियां इस संस्था की बदौलत परिणय सूत्र में बंधकर अपना नया संसार बसा चुकी हैं।
संस्था के प्रधान राजेंद्र पाल वर्मा और महासचिव मक्खन सिंह बताते हैं कि शादी की रस्में गुरुद्वारा साहिब में विधि-विधान से करवाई जाती है। कन्यादान से लेकर विदाई तक की हर रस्म को संस्था के सदस्य एक पिता और भाई की तरह निभाते हैं। ताकि बेटी को कभी यह महसूस न हो कि वह बेसहारा है।
वो एक जुमला जो दिल में चुभ गया
इस सेवा की नींव के पीछे की कहानी हर किसी को भावुक कर देती है। प्रधान राजेंद्र पाल वर्मा ने बताया कि साल 2010 में गुग्गा नवमी मेले के दौरान संस्था के सदस्य आपस में हंसी-मजाक कर रहे थे। मजाक में ही एक युवक को दूल्हा बना दिया गया। हंसी के माहौल में ही किसी ने एक जुमला कस दिया - गरीब की शादी कैसे होती है? यह बात हंसी में कही गई थी, लेकिन वहां मौजूद लोगों के दिल में गहरे तक चुभ गई।
सवाल था कि जिसके पास दो वक्त की रोटी का ठिकाना नहीं, वह अपनी बेटी की डोली कैसे उठाएगा? बस, उसी दिन तय हो गया कि अब गुग्गा नवमी मेले का दूसरा दिन किसी और के लिए नहीं, बल्कि इन्हीं बेबस बेटियों के नाम होगा। तब से यह परंपरा अनवरत जारी है।
मेले के शोरगुल के बीच जब एक गरीब पिता अपनी बेटी का हाथ संस्था के हाथों में सौंपता है और आंखों में आंसू लिए कहता है कि आज आप ही इसके बाबुल हो, तो वहां मौजूद हर आंख नम हो जाती है। यह सिर्फ शादी नहीं, बल्कि एक पिता का फर्ज है जो यह संस्था 16 साल से निभा रही है।
हर साल होती है 12 से 13 लड़कियों की शादी
संस्था द्वारा पहले वर्ष यानी 2010 में तीन जरूरतमंद परिवारों की लड़कियों की शादी करवाई गई थी। उसके बाद यह कारवां बढ़ता गया। इस समय हर साल मेले के दूसरे दिन 12 से 13 लड़कियों की शादी करवाई जा रही है।
लाखों रुपए का खर्च होता है बजट
इस बारे में राजेंद्र पाल वर्मा ने बताया कि शादियों के दौरान लाखों रुपए का बजट खर्च होता है। कारण एक शादी पर करीब सवा लाख रुपए का बजट निर्धारित किया गया है। जिसमें उपहार से लेकर तमाम रस्में पूरी की जाती है।
3 महीने पहले करते हैं तैयारी
संस्था द्वारा उक्त आयोजन को लेकर 3 महीने पहले से तैयारी की जाती हैं। जिसमें फंड एकत्रित करना व जरूरतमंद परिवारों की लड़कियों को ढूंढना तथा तमाम तरह के प्रबंध पूरे करना शामिल रहता है।
