यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Apr 07, 2022 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
फिरोजपुर में है 200 वर्ष पुराना शीतला माता मंदिर, जानें क्यों नवरात्र में बासी प्रसाद चढ़ाते हैं भक्त
फिरोजपुर शहर स्थित माता शीतला मंदिर में नवरात्र के अवसर पर भक्तों की लाइनें लगती है। अंखड ज्योत जला कर ...और पढ़ें

नरेश कुमार, फिरोजपुर। नवरात्र में फिरोजपुर के प्रसिद्ध शीतला माता मंदिर को फूलों रंग बिंगी लाइटों से सजाया गया। नवरात्र में इस मंदिर में भक्तों की लाइनें लगती है। अंखड ज्योत जला कर सुबह शाम भजन कीर्तन व आरती होती है, जिसमे सैकडों श्रद्धालु पहुंचकर मां का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। यह मंदिर फिरोजपुर का बहुत ही प्रसिद्ध मंदिर है। इसकी स्थापना लगभग 200 वर्ष पूर्व हुई थी।
पुजारी पंडित रजिंदर कुमार मिश्रा ने बताया कि भारतवर्ष में जहां कही भी कुम्हार मंडी होगी, वहां शीतला माता का मंदिर जरूर होगा। उन्होंने कहा कि इस मंदिर में पहले पिंडी की स्थापना की गई थी। 70 वर्ष पूर्व पिंडी की जगह पर मूर्ति की स्थापना कर दी गई। उसके बाद से ही मूर्ति की पूजा होने लगी।
पौराणिक कथा एवं महत्व
पं. मिश्रा ने बताया कि पुराणों में उल्लेख आता है कि जब भगवान शिव ने जगत कल्यान के लिए विष पिया तो विष के ताप से भगवान शिव चेतना खोने लगे तो माता शीतला ने भगवान शिव को पानी पिलाया। उससे भगवान शिव की चेतना लोट आई।
एक और पोराणिक कथा है कि एक बार गांववासी शीतला माता की पूजा-अर्चना कर रहे थे। पूजा के दौरान गांव वालों ने गर्म प्रसाद माता शीतला को चढ़ाया। गर्म प्रसाद से माता शीतला का मुंह जल गया। इससे माता शीतला नाराज हो गईं और पूरे गांव में आग लगा दी। गांव जल गया लेकिन एक वृद्धा का घर बच गया। जब लोगों ने पूछा तो वृद्धा ने बताया कि माता शीतला को प्रसाद खिलाने की बात कही। मैंने रात को ही प्रसाद बनाया और सुबह माता को ठंडा एवं बासी प्रसाद खिलाया। इसी कारण माता शीतला ने प्रसन्न होकर मेरे घर को जलने से बचा लिया।
वृद्धा की बात सुनकर गांव वालों ने माता शीतला से क्षमा याचना की तथा अगले पक्ष में सप्तमी/अष्टमी के दिन उन्हें बासी प्रसाद खिलाकर बसौड़ा पूजन किया। तब से लेकर अब तक शीतला माता का पर्व चैत्र मास में कृष्ण पक्ष की सप्तमी अथवा अष्टमी को मनाया जाता है। शीतला माता अपने साधकों के तन-मन को शीतल करने और समस्त तापों का नाश करने वाली मानी गई हैं। शीतला माता का पर्व चाहे षष्टी को हो, सप्तमी को हो या अष्टमी को इसे दूसरे नामों से भी जाना जाता है। बसौड़ा अथवा बसियौरा भी कहा जाता है। बसोडे को माता का भक्त बासी प्रसाद या ठंडे व्यंजनो का भोग लगाते हैं।
मान्यता ऐसी भी
पुजारी का कहना है कि ऐसी मान्यता है कि शीतला माता को कच्ची लस्सी का स्नान करवाने से चेचक और चमडी के कई रोगो से मुक्ति मिलती है।
