संवाद सहयोगी, दातारपुर

सभी शास्त्रों और ऋषियों मुनियों का यह मत है कि मनुष्य की ¨जदगी पानी के बुलबुले के समान है। कब यह बुलबुला फूट जाए, कब ऊपर वाले का बुलावा आ जाए, यह वक्त तय नहीं है। यह प्रवचन प्राचीन शिव मंदिर फतेहपुर में शुक्रवार को संक्रांति पर्व पर स्वामी महेश पुरी जी ने करते हुए कहा कि बाहर निकली हुई सांस दोबारा लौटेगी या नहीं, इसका भी कोई भरोसा नहीं है। मगर, इस क्षणभंगुर जीवन पर भी इंसान इतना घमंड करता है कि भला-बुरा, धर्म-अधर्म का ख्याल तक नहीं कर पाता और अपने ही ओछे कर्मो से अपना लोक-परलोक खराब कर लेता है।

उन्होंने कहा कि ऐसी हालत न हो, इसी मकसद से भजन, कीर्तन, सत्संग आदि को जीवन से जोड़ने की कोशिश की गई है। उपासना से अटूट विश्वास रखने पर जोर दिया गया है। सबसे बेहतर तरीका है कि इस संसार की सेवा में ही अपना सब कुछ न्योछावर कर दो।

उन्होंने कहा कि नर सेवा ही नारायण सेवा है। यह सिर्फ कहने वाली बात नहीं है। यदि इसे सही तरीके से जीवन में उतार लिया जाए, तो अपने आप सुख प्राप्त हो जाता है। उन्होंने कहा भजन, कीर्तन, सत्संग की अपनी महिमा है, लेकिन सेवा की महिमा सबसे बढ़कर है। दरअसल सेवा ही सच्ची पूजा है। इसके बाद अलग से और कुछ भी करने की जरूरत नहीं रह जाती है। हर इंसान के रूप में परमात्मा साक्षात हमारे सामने मौजूद है। इसलिए तन, मन व धन से, जो कुछ भी बन पाता है, बिना किसी स्वार्थ के सबको सुख पहुंचाने की चेष्टा करो। इसलिए इंसान को चाहिए कि वह भगवान की पूजा-अर्चना करते हुए अपने बच्चों को संस्कारवान बनाए। जिससे धर्म और समाज का कल्याण हो सके।

उन्होंने कहा कि इंसान को ऐसे कर्म करने चाहिए, जिससे उसका जीवन साकार हो जाए। समाज में ऐसे कार्य करें जिससे दूसरों का भला हो और समाजसेवा भी हो सके। नर सेवा से बढ़कर कोई दूसरी और सेवा नहीं हो सकती।

इस अवसर पर सु¨रदर कुमार, वीरेंद्र शास्त्री, मनु ठाकुर, अनंत राम मुकेश, सुनील सचिन, विशाल, राजेंद्र छोटू, रवि, दीपक, पारस व कमल आदि उपस्थित थे।

Posted By: Jagran

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