संवाद सहयोगी, दातारपुर : 25 जून 1975 के दिन पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा की थी और तमाम विपक्षी नेताओं को बिना दलील व अपील के कारागार में डाल दिया गया। भाजपा के जिला महामंत्री सतपाल शास्त्री तथा भाजपा के जिला सचिव संजीव भारद्वाज ने संयुक्त बयान में कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक मुकद्दमा जो राज नारायण बनाम उत्तर प्रदेश के नाम से था। 15 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने इस मामले में एक निर्णय दिया कि इंदिरा गांधी को चुनाव में धांधली और भ्रष्टाचार के चलते छह साल के लिए चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित किया जाता है। जिससे तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी इतना डर गई कि देश में आपातकाल ही लगा डाला।

शास्त्री तथा भारद्वाज ने कहा कि समूचे देश में पहले ही सरकार का विरोध हो रहा था। उधर, लोकनायक जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में आंदोलन चरम पर था। लेकिन इस मामले में सिन्हा ने अपने फैसले में न केवल इंदिरा गांधी को रायबरेली से सांसद के रूप में चुनाव को अवैध करार दिया बल्कि अगले छह साल तक उनके कोई भी चुनाव लड़ने पर रोक भी लगा दी। ऐसे में इंदिरा गांधी न लोकसभा की सदस्य रहीं, न ही राज्यसभा जा सकती थीं। सारे विकल्प तलाशने के बाद कांग्रेस की सरकार ने तय किया कि देश को आपातकाल के अंधकार में झोंक दिया जाए। शास्त्री तथा भारद्वाज ने कहा कि आज शोर मचाने वाली कांग्रेस ने उस समय अभिव्यक्ति के सभी साधनों पर प्रतिबंध लगाने का काम किया था। सभी यातनाओं, षड्यंत्रों के बावजूद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का भूमिगत गतिविधियां जारी रखने में महत्वपूर्ण योगदान रहा। भारद्वाज ने कहा कि आपातकाल में लोगों के सभी बुनियादी अधिकार छीन लिए गए। ये वे अधिकार हैं जिनके बिना किसी नागरिक का सर्वांगीण विकास संभव नहीं है। इन अधिकारों की प्राप्ति के लिए लोगों ने एक लंबी लड़ाई लड़ी थी। आपातकाल का जिसने भी विरोध किया, उन्हें जेलों में डाल दिया गया। इनमें अटल बिहारी वाजपेयी तथा लालकृष्ण आडवाणी के नाम भी शामिल हैं। इसके बावजूद लोकतंत्र के प्रहरी आपातकाल के खिलाफ लड़ते रहे और अंत में उन्हें विजय प्राप्त हुई। बाद के वर्षों में आपातकाल हटा दिया गया। जब लोकसभा के चुनाव हुए तो इंदिरा गांधी को हार का सामना करना पड़ा और वह सत्ता से बाहर हो गईं। इस तरह देश में लोकतंत्र का बहाल कराने में विपक्ष के नेताओं की बड़ी भूमिका रही।

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