हजारी लाल, होशियारपुर

सरकारी विभागों में भ्रष्टाचार का बोलबाल तो है, मगर सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार की बात उठने पर पहला नाम तहसील का आता है। क्योंकि यहां पर सीधी डी¨लग पब्लिक से होती है और यहां बिना सेवा पानी के काम नहीं होते हैं। बाहर से अंदर तक कमीशन का खेल चल रहा है। आलम ऐसा है कि कमीशन के चक्कर में ईमानदारों की भी बदनामी हो रही है।

रजिस्ट्री करवाने में जिस वसीका नसीब की अंदर से¨टग होती है। उसकी तूती बोलती है। वह अंदर भी कमीशन का मोटा हिस्सा पहुंचाता है और खुद भी मोटी मलाई डकारता है। सरकारी दावे कुछ भी किए जाते हों की कि दफ्तरों में भ्रष्टाचार नहीं हो रहा है, लेकिन तहसील परिसर में पहुंचते ही यह दावे झूठ के पु¨लदा दिखते हैं। सारे दावे रेत की महल की तरह धराशाई होते नजर आते हैं। क्योंकि यहां पर रजिस्ट्री करवाने के बदले में एक फीसदी कमीशन देना ही पड़ता है। कमीशन की से¨टग न होने तक रजिस्ट्री ही नहीं लिखी जाती है। यूं कहें की कि तहसील भ्रष्टाचार का अड्डा है। जहां पर बिना रिश्वत के कोई काम नहीं होता है, तो शायद कुछ गलत नहीं होगा। हालांकि सरकारी तंत्र आला अधिकारियों को भी इस गंदे खेल के बारे में सब कुछ पता है, मगर वह भी आंखों में पट्टी बांधकर बैठे हैं। विभागीय के आला अधिकारी गुप्त तरीके से जांच करें तो फैले भ्रष्टाचार को बेनकाब किया जा सकता है।

दैनिक जागरण ने अपने खास व्यक्ति को सारी असलियत जानने के लिए तहसील में भेजा की कि कैसे चलता है कमीशन का खेल तो परतें दर परतें खुलनी शुरू हो गईं।

राजिस्ट्री करवाने के लिए जब बात की गई तो तपाक से कहा गया की कि अंदर एक फीसदी कमीशन देना होगा। शख्स रजिस्ट्री लिखवाने के लिए एक वसीका नबीस से मिला। रजिस्ट्री का खर्च पूछने पर उसने स्टांप फीस, लिखाई फीस इत्यादि को जोड़ने के बाद एक फीसदी कमीशन लगने की बात कही तो उसने पूछा की कि यह क्या है? तो जवाब मिला की कि यह अंदर की फीस है। अगर कमीशन नहीं देना है तो सीधे संपर्क करना पड़ेगा। इस पर समझ में आ गया की कि जमीन की खरीद में जितने में का स्टांप लगेगा, उसका एक फीसद कमीशन देना होगा। बड़े मियां, बड़े मियां, छोटे मियां सुभान अल्लाह वाली कहानी यहां पर दिखती है। अंदर की से¨टग बाहर की जाती है। रजिस्ट्री करवाने वाला व्यक्ति अगर हां कर देता है तो रजिस्ट्री लिखने के बाद कोड र्वड में समझा दिया जाता है। फिर कहीं पर अड़चन हीं आती है। रिश्वत की पेमेंट होने के साथ ही रजिस्ट्री दे दी जाती है। और तो और अंदर कुछ क्लर्कों ने भी फीस रखी है

कमीशन के खेल पर थोड़ा और वर्क किया गया। इस पर मालूम पड़ा की कि अंदर कुछ क्लर्कों ने भी फीस फिक्स कर रखी है। बिना फीस लिए फाइल आगे नहीं सरकती है। इसके बदले में 300 से 500 रुपए तक फीस वसूली जाती है। बिल्कुल साफ दिखता है कि कुर्सी दर कुर्सी माया की बोली समझती है। इस चक्कर में ईमानदारी बाबू भी बदनामी मोल ले रहे हैं।

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उनसे करें शिकायत: डीसी ईशा कालिया

इस बारे में डीसी ईशा कालिया से बात करने पर उन्होंने कहा कि इस तरह से नहीं किया जा सकता है। अगर किसी को कोई शिकायत है तो उनके ध्यान में लेकर आए। वह इसकी जांच करके बनती कार्रवाई करेंगी।

Posted By: Jagran

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