संवाद सहयोगी, दातारपुर

हिंदू शास्त्रों के अनुसार प्रत्येक वर्ष भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी को हिंदुओं का प्रमुख त्योहार गणेश चतुर्थी मनाया जाता है। बाबा लाल दयाल आश्रम दातारपुर में महंत रमेश दास ने बताया कि गणेश पुराण में वर्णित कथाओं के अनुसार इसी दिन समस्त विघ्न बाधाओं को दूर करने वाले, कृपा के सागर तथा भगवान शंकर और माता पार्वती के पुत्र श्री गणेश जी का आविर्भाव हुआ था।

उन्होंने बताया कि भगवान विनायक के जन्मदिन पर मनाया जाने वाला यह महापर्व महाराष्ट्र सहित भारत के सभी राज्यों में हर्षोल्लासपूर्वक और भव्य तरीके से आयोजित किया जाता है।

कथा के अनुसार एक बार मां पार्वती ने स्नान करने से पूर्व अपनी मैल से एक सुंदर बालक को उत्पन्न किया और उसका नाम गणेश रखा। फिर उसे अपना द्वारपाल बना कर दरवाजे पर पहरा देने का आदेश देकर स्नान करने चली गई। थोड़ी देर बाद भगवान शिव आए और द्वार के अंदर प्रवेश करना चाहा तो गणेश ने उन्हें अंदर जाने से रोक दिया। इस पर भगवान शिव क्रोधित हो गए और अपने त्रिशूल से गणेश के सिर को काट दिया और द्वार के अंदर चले गए। जब मां पार्वती ने पुत्र गणेश का कटा हुआ सिर देखा, तो अत्यंत क्रोधित हो गई। तब ब्रह्मा, विष्णु सहित सभी देवताओं ने उनकी स्तुति कर उनको शांत किया और भोलेनाथ से बालक गणेश को ¨जदा करने का अनुरोध किया। महामृत्युंजय रुद्र ने उनके अनुरोध को स्वीकारते हुए एक गज के कटे हुए मस्तक को श्री गणेश के धड़ से जोड़ कर उन्हें पुनर्जीवित कर दिया।

---

गणेश चतुर्थी पूजा विधि

महंत जी ने कहा इस महापर्व पर लोग प्रात: काल उठकर सोने, चांदी, तांबे अथवा मिट्टी के गणेश जी की प्रतिमा स्थापित कर षोडशोपचार विधि से उनका पूजन करते हैं।

पूजन के बाद नीची नजर से चंद्रमा को अ‌र्घ्य देकर ब्राह्माणों को दक्षिणा देते हैं। इस पूजा में गणपति को 21 लड्डुओं का भोग लगाने का विधान है। उन्होंने कहा, मान्यता अनुसार इन दिन चंद्रमा की तरफ नहीं देखना चाहिए।

Posted By: Jagran