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पिता से सीखा राजनीति का पाठ, कांग्रेस से अकाली सियासत तक की सियासत, ऐसा रहा वरिंदर सिंह बाजवा सियासी सफर

Published: Sun, 13 Sep 2026 08:02 AM (IST)

वरिष्ठ अकाली नेता और पूर्व राज्यसभा सदस्य वरिंदर सिंह बाजवा का 82 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्होंने अपने पिता से राजनीति सीखकर कांग्रेस से शुरुआत की।

वरिंदर सिंह बाजवा का ऐसा था राजनीतिक सफर।

वरिंदर सिंह बाजवा का ऐसा था राजनीतिक सफर।

HighLights

  1. वरिष्ठ अकाली नेता वरिंदर सिंह बाजवा का 82 वर्ष की आयु में निधन

  2. 2004 से 2010 तक राज्यसभा सदस्य के रूप में सेवा की

  3. कांग्रेस से शुरू कर 1984 के बाद अकाली दल में शामिल हुए

होशियारपुर। वरिष्ठ अकाली नेता एवं पूर्व राज्यसभा सदस्य वरिंदर सिंह बाजवा का शनिवार को 82 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। वह पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे। उनके निधन से शिरोमणि अकाली दल को बड़ा झटका लगा है।

जिला अकाली राजनीति में लंबे समय तक सक्रिय रहे बाजवा ने पार्टी संगठन में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं और राष्ट्रीय स्तर पर भी पंजाब की आवाज उठाई।

पिता से सीखा राजनीति का ककहरा

वरिंदर सिंह बाजवा को राजनीति विरासत में मिली थी। उनके पिता बलवंत राय बाजवा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता थे। बचपन से ही राजनीतिक माहौल में पले-बढ़े वरिंदर सिंह ने अपने पिता से राजनीति के दांव-पेच और संगठन चलाने का ककहरा सीखा। यही राजनीतिक संस्कार आगे चलकर उनके सार्वजनिक जीवन की मजबूत नींव बने।

1984 के बाद बदली राजनीतिक राह

वर्ष 1984 में दरबार साहिब पर हुए सैन्य हमले के बाद बाजवा ने कांग्रेस से नाता तोड़ लिया और शिरोमणि अकाली दल में शामिल हो गए। इसके बाद उन्होंने अकाली दल की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई। धीरे-धीरे वह पार्टी संगठन में अपनी अलग पहचान बनाने में सफल रहे।

जिला स्तर पर पार्टी को मजबूत करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। वह लंबे समय तक शिरोमणि अकाली दल के जिला प्रधान रहे। इसके अलावा उन्होंने जथेदार के रूप में भी जिम्मेदारी संभाली। संगठन के भीतर उनकी पकड़ और पार्टी के प्रति निष्ठा के चलते उन्हें समय-समय पर कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी गईं।

राज्यसभा तक पहुंचा राजनीतिक सफर

वरिंदर सिंह बाजवा के राजनीतिक जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव उस समय आया, जब उन्हें संसद के उच्च सदन राज्यसभा में जाने का अवसर मिला। वह 2004 से 2010 तक राज्यसभा सदस्य रहे। इस दौरान उन्होंने पंजाब और विशेषकर अपने क्षेत्र से जुड़े मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने का प्रयास किया।

करीब छह दशक के राजनीतिक सफर में उन्होंने पार्टी संगठन से लेकर संसद तक विभिन्न जिम्मेदारियां निभाईं। अकाली राजनीति में उनकी पहचान एक ऐसे नेता के रूप में रही, जिसने लंबे समय तक संगठन के साथ जुड़कर काम किया और कई राजनीतिक उतार-चढ़ाव देखे।

राजनीतिक सफर में कई दौर देखे

बाजवा का राजनीतिक जीवन पंजाब की बदलती राजनीति का भी गवाह रहा। कांग्रेस से राजनीतिक जीवन की शुरुआत करने के बाद 1984 के बाद अकाली दल में शामिल हुए

वरिंदर सिंह बाजवा का राजनीतिक सफर इस मायने में खास रहा कि उन्होंने पिता से मिले कांग्रेस के राजनीतिक संस्कारों से शुरुआत की, लेकिन 1984 के बाद अपनी राजनीतिक दिशा बदलते हुए अकाली दल में ऐसी पहचान बनाई, जो दशकों तक कायम रही।

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