माहिलपुर/गढ़शंकर (होशियारपुर)। किसान पराली को मुसीबत समझकर खेतों में आग लगा रहे हैं। सरकार और पर्यावरण प्रेमी किसानों को समझाने में जुटे हैं कि पराली को जलाकर पर्यावरण में जहर घोलने का काम बंद करें। पराली वाकई में मुसीबत नहीं है। ये वरदान भी है। होशियारपुर जिले के गांव बिन्जों में पराली से बिजली पैदा की जा रही है।

मुंबई के रहने वाले लॉड साहिब, कमलेश और गोमानी तीन कारोबारियों ने मिलकर गांव बिन्जों में एनर्जी प्लांट लगाया है। ग्रीन प्लांट एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड की ओर से फसलों को वेस्ट खरीदा जा रहा है। इससे किसान फसल के वेस्ट को जलाने के बजाय एनर्जी प्लांट में बेच रहे हैं। किसानों को इससे आमदनी तो रही है साथ ही क्षेत्र के लोगों को रोजगार भी मिल रहा है। इस एनर्जी प्लांट की ओर से पराली, गन्ने का वेस्ट, तूड़ी, सफेदा, पापुलर, सरसों आदि का वेस्ट खरीदा जाता है। पराली से प्लांट में बिजली पैदा की जा रही है।

गांव बिन्जों में एनर्जी प्लांट का काम 2009 में शुरू किया गया था। 2010 में प्लांट ने काम करना शुरू कर दिया। प्लांट में 135 कर्मचारी व अधिकारी मौजूदा समय में काम कर रहे हैं। प्लांट की बिजली पैदा करने की क्षमता छह मेगावॉट की है। यहां से पैदा बिजली 66 केवी सब स्टेशन कोट फतूही और महिलपुर के तहत आने वाले गांवों को दी जा रही है। क्षेत्र में लगातार बिजली मिलने से इस क्षेत्र के किसान भी खुश हैं।

135 रुपये प्रति क्विंटल बिकती है पराली

प्लांट मैनेजर जसपाल सिंह का कहना है कि होशियारपुर के अलावा, दसूहा, टांडा, कपूरथला, माछीवाडा, नवांशहर, आदमपुर, जालंधर से भी किसानों से फसलों का वेस्ट खरीदा जा रहा है। पराली 135 रुपये प्रति क्विंटल, पत्ता कुटी 200 रुपये प्रति क्विंटल, गन्ने की वेस्ट 150 रुपये, तूड़ी 200 रुपए और धान का वेस्ट 180 रुपये प्रति क्विंटल खरीदा जाता है। प्लांट से क्षेत्र के 500 से अधिक परिवार जुड़े हुए हैं।

80 से 90 टन पराली रोज होती है इस्तेमाल

प्लांट में हर रोज 280 से 300 टन पराली आती है। 80 से 90 टन पराली और अन्य वेस्ट मिलाकर छह मेगावॉट बिजली पैदा की जाती है। 2018 में 25 से तीस हजार टन पराली आने के आसार हैं। इस तरह का एक प्लांट गांव बीर (नकोदर) में भी लगा हुआ है। मालवा में गांव माणूके गिल (मोगा) में भी ऐसा प्लांट लगाया जा रहा है।

एक एकड़ में 15 से 20 क्विंटल पराली

चाहलपुर से पराली बेचने आए कुलदीप सिंह और जसकरण सिंह ने बताया कि एक एकड़ में 15 से 20 क्विंटल पराली इकट्ठा हो जाती है। एक एकड़ पर पराली के गट्ठे बनाने के लिए 1500 रुपये का खर्च आता है।

सरकार ऐसे प्लांट लगाने के लिए दे बढ़ावा : विजय बंबेली

पर्यावरण प्रेमी विजय बंबेली का कहना है कि फसलों के वेस्ट से बिजली पैदा करने वाले प्लांटों को सरकार को बढ़ावा देना चाहिए। 60 किलोमीटर के बाद ऐसा प्लांट होना चाहिए।

प्लांट के बारे में

  • 2010 में प्लांट ने काम करना शुरू किया था
  • 135 कर्मचारियों को मिला है प्लांट में रोजगार
  • 66 केवी सब स्टेशन कोट फतूही व महिलपुर को दी जा रही बिजली
  • 500 से अधिक परिवार जुड़े हैं प्लांट से
  • 2018 में 25-30 हजार टन पराली आने के आसार
  • 1500 रुपये खर्च आता है एक एकड़ में गट्ठे बनाने पर
  • 60 किलोमीटर के बाद ऐसा प्लांट बनाने की जरूरत

सराहनीय प्रयास...

पराली संभाल के लिए गोद लिए चार गांव

लुधियाना के समराला में पराली को जलाने से बचाने के लिए कृषि विज्ञान केंद्र ने 4 गांव गोद लिए हैं। किसानों को जागरूक करने के लिए 4 गांवों में जगह-जगह पर नारे लिखवाए गए हैं, जिसमें उन्होनें बताया कि पराली जलाने से क्या-क्या नुकसान  हैं। किसानों को इनसे काफी फायदा मिल रहा है।

यह चार गांव हैं गोंसलां, पवात, घुलाल व दीवाला। पराली की संभाल के लिए कृषि विज्ञान केंद्र ने एक गांव में 150 एकड जमीन लेकर प्रदर्शनी लगाने का फैसला किया है। चारों गांवों में 600 एकड़ जगह में प्रदर्शनी लगाई जाएगी। इस प्रदर्शनी में बताया जाएगा कि किस तरह पराली की संभाल की जानी है, जिससे धरती की उर्वरता भी बढ़ेगी और आगे से पैदावार भी ज्यादा होगी। पर्यावरण प्रदूषण के साथ फसलों की पैदावार पर पडऩे वाले असर के बारे में भी बताया जाएगा।

कृषि विज्ञान केंद्र की ओर से चलाई गई इस मुहिम को चार गांवों में अच्छा समर्थन मिल रहा है। उन्होंने बताया कि कंबाइन के पीछे एसएमएस लगा कर पराली को खेत में ही कुतर दिया जाता है। जहां पहले कंबाइन से पराली की कटाई करवाते थे, वहां पराली के ढेर लग जाते थे, जिसे देखकर किसान संभालने की बजाय आग लगाने के लिए मजबूर हो जाता था।

अब चारों गांवों में प्रदर्शनी में कृषि विज्ञान केंद्र की ओर से फ्री मशीनरी दी जाएगी, जो पराली को संभालने के लिए किसानों के काम आएगी। कृषि विज्ञान केंद्र ने यह भी फैसला किया है कि अगर उन्हें किराए पर भी किसानों को मशीनरी लेकर देनी पड़े तब भी वह लेकर देंगे। कृषि विज्ञान केंद्र की ओर से अगस्त में 100 किसानों को ट्रेनिंग दी गई है। किसान इससे प्रभावित होकर आस-पास के किसानों को जागरूक करने में जुट गए थे।

दस गांवों तक पहुंचाई मुहिम

किसान सुखवीर सिंह दीवाला जो रासायनिक खाद के बिना सब्जियों की बिजाई कर रहा है। उनका कहना है कि इस मुहिम को आगे पहुंचाने के लिए वह अब तक करीब 10 गांवों में किसानों को जागरूक कर चुके हैं। आगे भी वह किसानों को जागरूक करते रहेंगे कि पराली को आग न लगाएं। विज्ञान केंद्र ने यह भी फ  सला लिया है कि इन चारों गांवों के बाद इस मुहिम को ओर तेज किया जाएगा ताकि गांव को आग से मुक्त किया जाए।

उपाय बहुत हैं....

पशुओं के लिए बनाया पौष्टिक चारा

गुरु अंगद देव वेटरनरी एंड एनिमल साइंस यूनिवर्सिटी (गडवासू) लुधियाना के पशु आहार विभाग ने यूरिया, फल व सब्जियों के वेस्ट एवं पराली से पशुओं के लिए अचार (पौष्टिक चारा) बनाने पर शोध किया है। इसे बनाना बेहद आसान है। 14 किलो यूरिया को 200 लीटर पानी में घोलना होता है। घोल को 400 किलो तूड़ी व पराली पर छिड़कना होता है। इसके बाद पराली को अच्छे से मिलाया जाता है। फिर पराली को कूप या बंद कमरे में नौ दिन के लिए छोड़ दिया जाता है।

ध्यान रखें जिस जगह पर यह यूरिया कोटेड पराली रखी जा रही है, उसके अंदर न हवा जा सके। नौ दिन में पराली से अमोनिया गैस निकल जाएगी, जो बाद में प्रोटीन में तब्दील हो जाती है। दसवें दिन से उक्त पराली को जरूरत के हिसाब से पशुओं को दिया जा सकता है। छह माह से कम के पशु को यह खुराक नहीं देनी चाहिए। इस तरह से तैयार की गई पराली में छह से आठ फीसद कच्ची प्रोटीन, तीन से चार फीसद पाचनयोग्य प्रोटीन, रेशे की पाचन योग्य शक्ति 70 से 75 फीसद, कुल पाचन योग्य तत्व 50 से 55 फीसद तक हो जाती है। यूरिया ट्रीटेड पराली को छह महीने तक स्टोर किया जा सकता है।

इसके अलावा सेब के वेस्ट से अचार बनाने के लिए सेब के वेस्ट को कुतरी हुई पराली में मिलाना होता है। ठीक इसी तरह सब्जियों जैसे कि आलू, शलजम, गाजर या अन्य सब्जियों के छोटे-छोटे हिस्से करके उसे भी कुतरी हुई पराली में मिलाकर अचार बनाया जा सकता है। इसके लिए 70 फीसद वेजीटेबल या फ्रूट वेस्ट या फिर सेब के वेस्ट में 30 फीसद धान या गेहूं की पराली को लिया जाता है, जिसे अच्छे से मिलाकर उसे 45 दिन के एयर टाइट पॉलीथिन में भर कर बंद रखना होता है। 45 दिन में यह मिश्रण साइलेज (आचार) में तब्दील हो जाता है, जिसे बाद में पशुओं को खिलाया जा सकता है। इस तरह की पराली को पशुओं को खिलाने से उनकी पाचन शक्ति में सुधार आता है।

वेटरनरी यूनिवर्सिटी के सीनियर न्यूट्रिशियनिस्ट डॉ. एपीएस सेठी के अनुसार जिन किसानों के खेतों में पराली अधिक होती है, वे इसे यूरिया के साथ शोध (ट्रीट) कर पशुओं के लिए पौष्टिक आहार बना सकते हैं। उनके अनुसार पराली से पशुओं के लिए पौष्टिक खुराक बनाने की ट्रेनिंग पशु पालक उनसे ले सकते हैं। इसके लिए पांच दिन की हैंड जोन ट्रेनिंग दी जाती है। किसान इस शोध का फायदा उठाकर न सिर्फ अपने दुधारू पशुओं के लिए पौष्टिक खुराक जुटा सकते हैं, बल्कि इसे डेयरी फार्मों को बेचकर अतिरिक्त आय भी अर्जित कर सकते हैं।

ये बने मिसाल...

11 वर्षों से पराली को मिट्टी में मिलाकर ले रहे गेहूं की बंपर फसल

राज्य में धान की पराली की संभाल किसानों के लिए समस्या बनी हुई है। फरीदकोट में कई किसान जहां पराली को आग लगा रहे हैं, वहीं कुछ ऐसे किसान भी हैं, जो दूसरे किसानों के लिए प्रेरणास्रोत बन रहे हैं। पराली की समस्या के समाधान के लिए गांव वाड़ा दराका का किसान गुरविंदर सिंह बराड़ 11 वर्षों से आग लगाए बिना ही धान की पराली का प्रबंध कर रहे हैं। वह अपनी जमीन पर धान की पराली को आग लगाए बिना ही पराली को जमीन में ही जोत कर गेहूं की बिजाई करते आ रहे हैं। इससे उन्हें बंपर फसल मिल रही है। गुरङ्क्षवदर ङ्क्षसह के पास कुल 7 एकड़ जमीन है और 7 एकड़ रकबे में धान की बिजाई करते हैं।

3 एकड़ जमीन ठेके पर लेकर उसमें सब्जी की खेती करते हैं। गुरविंदर सिंह बराड़ ने बताया कि वो पिछले काफी समय से खेतीबाड़ी विभाग से जुड़े हुए हैं और विभाग की सिफारिशों के मुताबिक ही खेती करते आ रहे हैं। उन्होंने अन्य किसानों को पराली के प्रबंधन के लिए प्रेरित करते हुए कहा कि किसानों को पराली को नहीं जलानी चाहिए। इसको जमीन में ही रोटावेटर हैप्पी सीडर से जोत कर गेहूं की बिजाई करनी चाहिए। ऐसा करने से जमीन की उपजाऊ शक्ति बनी रहती है और जमीन में जरूरी तत्व नाइट्रोजन, पोटाश फासफोरस और सल्फर आदि भी नष्ट नहीं होते।

उसने बताया कि पराली को खेत में जोत देने से उसका खाद पर खर्चा भी कम हुआ है और फसल का झाड़ भी अच्छा प्राप्त हो रहा है। इसके अलावा पिछले कुछ वर्षों से उसके खेत में मित्र कीड़े भी मिलने लगे हैं। पराली को जलाने से सूक्ष्म तत्थों और मित्र कीड़ों का बहुत नुकसान होता है। वातावरण को प्रदूषित रहत रखने वाले किसान गुरविंदर सिंह बराड़ का यह प्रयत्न बहुत ही प्रशंसनीय है।

लोगों की राय...

पराली से बनाएं कागज

जालंधर निवासी राजेश कुमार का कहना है कि अमेरिका की आयोवा स्टेट यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉन हॉफस्ट्रैंड के अनुसार,'हम जिस पराली को परेशानी समझ रहे हैं वह ऊर्जा का बेशकीमती स्रोत है। धान, मक्का, गेहूं जैसी फसलों के अवशेष का इस्तेमाल फाइबर बोर्ड और कागज बनाने में किया जा सकता है। अगर पेपर इंडस्ट्री में इसका इस्तेमाल हो, तो कागज बनाने के लिए जरूरी फाइबर का लगभग चालीस फीसद हिस्सा फसलों के अवशेष से मिल सकता है।'

राजेश का कहना है कि केंद्र और राज्य सरकारों को मिलजुल पराली संभालने के लिए प्रयास करने चाहिए। पंजाब सरकार ने पराली के प्रबंधन के लिए मशीनरी पर काफी सब्सिडी बेशक दे रखी है, लेकिन इसे प्राप्त करने के लिए शायद किसानों को जटिल प्रक्रिया से गुजरना पड़ता होगा, तभी बहुत से किसान पराली प्रबंधन की मशीनरी हासिल करने की बजाय पराली को खेतों मे ही जला देते होंगे। सरकार को इस पर विचार गंभीरता से करना चाहिए।

पराली की समस्या में ही इसका समाधान छिपा हुआ है। इसमें सबसे प्रचलित समाधान बायोमास प्लांट भी है। पंजाब में कुछ जगह शायद यह प्लांट शुरू हुए भी, लेकिन यह नाममात्र के हैं। इस वर्ष भी पंजाब में करोड़ों टन पराली निकलने की संभावना है। ऐसे में पराली से बिजली बनाने व जैविक खाद व फ्यूल ब्रिक्स बनाने के बड़े प्लांट लगाने की आवश्यकता है।

किसानों को मिले पराली प्रबंधन का खर्च

महलकलां (बरनाला) के भान सिंह का कहना है कि पराली का प्रबंधन आसान बात नहीं है। इसमें बहुत खर्च आता है। एक एकड़ पराली के प्रबंधन में 1200 रुपये से 2400 रुपये तक का खर्च आता है। गेहूं की बिजाई के समय कम होता है, इसलिए किसान सस्ता और आसान तरीका चुनते हैं। सरकार किसानों को पराली प्रबंधन का खर्च एडवांस में मुहैया करवाए। तभी इस समस्या का समाधान संभव है। (इनपुटः रामपाल भारद्वाज, धर्मेंदर सचदेवा व राजीव शर्मा)

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Posted By: Kamlesh Bhatt