संवाद सहयोगी, होशियारपुर : सरकारी स्कूलों के प्रिसिपल व प्रबंधकों के लिए कानूनी मामलों में फंड उपलब्ध करवाना परेशानी का सबब बन गया है। अकसर देखने में आया है कि कई सेवानिवृत्त कर्मचारी क्वारी को लेकर कोर्ट में चले जाते हैं और वहां से स्कूल को समन भिजवा देते हैं। इसका जवाब नहीं देने पर न्यायालय की अवमानना का सामना करना पड़ता है। लेकिन अगर वकील को फीस देनी पड़े, तो वह फंड कहां से लाएं। ऐसे में उनके पास एक ही रास्ता होता है कि जेब से खर्च अथवा स्टाफ से कलेक्शन करें। मामले को जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय में भेजने पर संबंधित दस्तावेजों के साथ साथ वकील के शुल्क की मांग की जाती है क्योंकि, प्रिसिपल खुद अदालतों के चक्कर में नहीं पड़ना चाहते इसलिए वह शिक्षा अधिकारी कार्यालय में ऐसे मामलों को डील करने वाले कर्मचारी को फीस पहुंचा कर निश्चित हो जाते हैं, जो व्यक्ति या पूर्व कर्मचारी अदालत में मामला दर्ज करता है, वह पूरे मामले में विभाग के उच्च अधिकारियों को भी पार्टी बना लेता है। इसके चलते प्रिसिपल के लिए समस्या पैदा हो जाती है कि वह उच्च अधिकारियों को क्या जवाब दें। अधिकारी भी प्रिसिपल की तरफ से पूरा मामला भेज कर अदालत में जवाब देने का इशारा कर देते हैं। यह शुल्क 3000 से लेकर 10,000 तक भी हो सकता है। कई बार मामला छोटी मोटी इंक्रीमेंट को लेकर सीमित रहता है, लेकिन इसकी अदायगी स्कूल के किसी फंड में से नहीं की जा सकती। पंजाब स्कूल टीचर्स यूनियन के अध्यक्ष बहादुर सिंह और व्यवस्था से आहत प्रिसिपल का कहना है कि विभाग को ऐसे मामलों की अदायगी स्कूल के फंड में से करने की इजाजत दी जानी चाहिए। इसके अलावा सरकार को सरकारी वकील को कर्मचारियों अर्थात प्रिसिपल से ऐसे मामले का जवाब देने के लिए कोई शुल्क न लेने का पत्र जारी करना चाहिए।

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