संवाद सहयोगी, किला लाल सिंह : आधुनिकता की अंधी दौड़ में हम अपने पुरातन त्योहारों को भूलते जा रहे हैं। इस वजह से हमारी आने वाली पीढ़ी इन त्योहारों को मनाना तो दूर उनके बारे में जानती तक ना होगी। बेशक समय के साथ चलना बहुत जरूरी है। मगर हमें इतना तेज भी नहीं चलना चाहिए कि हम अपने बुजुर्गो की तरफ से चलाए गए पुरातन सभ्याचार, अमीर विरसे व त्योहारों को किनारे कर समय की इस अंधी दौड़ में सिर्फ आगे ही दौड़ते जाएं।

इस संबंधी प्रिसिपल मैडम तेजिदर कौर, प्रिसिपल मैडम हरविदर कौर, प्रिसिपल मैडम वसुधा शर्मा, मैडम प्रभजोत कौर तथा शीबा गिल ने कहा कि कभी समय था कि जब लोग बड़ी ही बेसब्री से सावन माह का इंतजार करते थे। पूरे साल में से यही सावन का ऐसा महीना होता था, जिसे पूरा माह लोग बड़ी ही खुशियों से मनाया करते थे। नई नवेली दुल्हनें पूरा श्रृंगार कर इस खुशियों के त्यौहार को अपने सखियों के साथ मनाती थीं। सावन माह की सबसे बड़ी बात यह भी है कि ज्यादातर इस समय आग बरसाती गर्मी को सावन की बरखा मिटाकर सभी के दिलों को ठंडक में भर देती है। पहले सावन माह की खुशी में ज्यादातर घरों में खीर मालपुए बनाए जाते थे।

सावन माह में नौजवान मुटियारें इकट्ठी हो हंसी खुशी में झूले झूलती थीं। नई दुल्हनें ज्यादातर अपना पहला सावन माह मायके में मनाने जाती थीं। तीज के त्यौहार में गांव की सभी लड़कियां व दुल्हनें इकट्ठी हो गांव के किसी खुली स्थान पर शाम को गिद्दा व बोलियां डालती थीं। मगर अब इसे आने वाली पीढ़ी की बदकिस्मती ही कहा जा सकता है कि उन्हें ऐसा हंसी-खुशी वाले माहौल के इस तरह के त्योहार देखने को नहीं मिलेंगे।

समय की रफ्तार इतनी तेजी से आगे बढ़ रही है कि हम सभी से ऐसे खुशियों भरे त्योहार दूर होते जा रहे हैं। आजकल नौजवान लड़कियां व दुल्हनें मिलजुल कर ऐसे त्यौहार मनाने के स्थान पर मोबाइल के व्हाट्सएप, फेसबुक, ट्वीटर, इंस्टाग्राम में इतनी गहरी खो चुकी है कि उन्हें तीज के त्यौहार की कोई अहमियत ही ज्ञात नहीं रही। आधुनिकता में समय की इस तरफ रफ्तार ने नई पीढ़ी को इन त्योहारों को पीछे धकेल बुजुर्गो के दिलों को काफी ठेस पहुंचाई है। अब समय की यह मांग है कि हम अपने पुरातन चलते आ रहे सभ्याचार मेलों, विरसे व त्योहारों को पहले की ही भांति हंसी खुशी से मनाना फिर से शुरू करें।

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