फिरोजपुर [प्रदीप कुमार सिंह]। पाकिस्तान से लगे सीमाई क्षेत्र में संवेदनशीलता के चलते यूं तो रोजमर्रा की जिंदगी ही मुश्किलों भरी होती है। ऐसे में बारिश के दिनों में सतलुज नदी तमाम गांवों को टापू में बदल देती है। रहे-सहे बच्चे भी स्कूल आना छोड़ देते हैं और उनकी पढ़ाई छूट जाती है। लेकिन सीनियर सेकेंडरी स्कूल गट्टी राजोके में सभी बच्चे लौट आए हैं।

स्कूल के प्रिंसिपल डॉ. सतिंदर सिंह ने इस चुनौती को स्वीकार किया। उनकी मेहनत का ही परिणाम है कि भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा व सतलुज के बीच स्थित गांवों के पढ़ाई छोड़ चुके बच्चे स्कूल में लौट आए हैं। कभी पढ़ाई छोड़ देने वाले ये बच्चे आज उफनती नदी को नाव के जरिये पार कर स्कूल पहुंचते हैं। खुद प्रिसिंपल ने उन्हें यह राह दिखाई।

अप्रैल 2017 में डॉ. सतिंदर सिंह की जब इस स्कूल में पोस्टिंग हुई, तब पहली समस्या बच्चों को स्कूल में लाने की थी। वह बताते हैं कि सरहद के पास स्थित गांव कहलूवाला बारिश के मौसम में टापू में तब्दील हो जाता है। बरसात के मौसम के बाद बच्चे फिर अगली गर्मियों में ही स्कूल आते थे।

इस दौरान कई बच्चें पढ़ाई ही छोड़ देते थे। गरीब माता-पिता बच्चों को कृषि मजदूरी में लगा देते। इन बच्चों को नियमित स्कूल लाना और पढ़ाई छोड़ चुके बच्चों की पढ़ाई शुरू कराना मेरे लिए एक चुनौती थी। मैंने घर-घर जाकर अभिभावकों को बच्चों को स्कूल भेजने के लिए समझाना शुरू कर दिया। भारी मशक्कत करनी पड़ी।

पहले दिन एक बच्चा स्कूल आने को तैयार हुआ। उसे मैं स्वयं नाव से स्कूल लेकर आया। यह सिलसिला चलता रहा और फिर धीरे-धीरे अन्य बच्चे नाव से स्कूल आने लगे। स्कूल में अब 650 बच्चे नियमित आते हैं। नौवीं से बारहवीं कक्षा के पढ़ाई छोड़ चुके 35 विद्यार्थी स्कूल में लौट आए हैं। इस बार स्कूल

छोड़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या नगण्य रही है।

बारिश में टापू बने गांवों के बच्चे छोड़ देते थे पढ़ाई। नाव के सहारे एक-एक बच्चे को लौटा लाए सीनियर सेकेंडरी स्कूल गट्टी राजोके के प्रिंसिपल डॉ. सतिंदर सिंह। 

By Sanjay Pokhriyal