विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

मरुस्थल बनने की कागार पर पंजाब का सबसे छोटा जिला फतेहगढ़ साहिब, 30 मीटर गिरा भूजल

Published: Wed, 02 Sep 2026 07:00 AM (IST)

पंजाब का फतेहगढ़ साहिब जिला भूजल के अत्यधिक दोहन के कारण मरुस्थलीकरण के कगार पर है, जहां दोहन राज्य के औसत से 26% अधिक है।

पंजाब का फतेहगढ़ साहिब जिला भूजल संकट से मरुस्थल बनने की ओर। एआई जेनरेटेड तस्वीर।

पंजाब का फतेहगढ़ साहिब जिला भूजल संकट से मरुस्थल बनने की ओर। एआई जेनरेटेड तस्वीर।

HighLights

  1. फतेहगढ़ साहिब में भूजल दोहन राज्य औसत से 26% अधिक

  2. जिले के 80% हिस्से में गंभीर जल संकट बरकरार

  3. सरहिंद ब्लॉक में नहरी पानी से भूजल स्तर में सुधार

नवनीत छिब्बर, फतेहगढ़ साहिब। पंजाब के सबसे छोटे जिले पर मरुस्थल बनने का खतरा मंडरा रहा है। जिला फतेहगढ़ साहिब देश के उन 19 जिलों में शामिल है जो भूजल के अति दोहन की श्रेणी में आते हैं। जिले में भूजल का दोहन राज्य के औसत से 26 प्रतिशत ज्यादा है।

हालांकि, जिले के पांच ब्लॉकों में से सरहिंद ब्लॉक में 10 प्रतिशत सुधार दर्ज किया गया है, इसके बावजूद जिला रेड जोन में बना हुआ है। केंद्रीय भूजल बोर्ड के ताजा वैज्ञानिक आंकड़े बता रहे हैं कि जिला पानी के मामले में कंगाली की कगार पर है।

सीजीडब्ल्यूबी यानि सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड और पंजाब सरकार की संयुक्त रिपोर्ट भूजल संसाधन 2024-25 के अनुसार जिले के पांच ब्लॉकों की कहानी अलग-अलग है। यह रिपोर्ट दिसंबर 2025 तक हुए सर्वेक्षण के आधार पर तैयार की गई है। सरहिंद ब्लॉक में थोड़ी राहत है। यहां नहरी पानी पहुंचने से भूजल स्तर में 10 प्रतिशत से ज्यादा सुधार दर्ज हुआ है।

हालांकि, यह सुधार भूजल स्तर में बढ़ोतरी का नहीं, बल्कि भूजल दोहन में आई कमी का है। यह उन 81 ब्लॉकों में शामिल है जहां पूरे पंजाब में सुधार हुआ है। लेकिन यह राहत सिर्फ एक ब्लॉक तक सीमित है। जिले के खमाणों, बस्सी पठाना, अमलोह और खेड़ा ब्लॉक अभी भी रेड जोन में हैं। इन चार ब्लॉकों में दोहन 180 प्रतिशत से ऊपर है और जल स्तर 25 से 35 मीटर नीचे जा चुका है। यानी जिले के 80 प्रतिशत हिस्से में संकट जस का तस है, जबकि 20 प्रतिशत में ही हल्का सुधार दिखा है।

सीजीडब्ल्यूबी के दो दशक के उपग्रह अध्ययन के अनुसार 2000 में इस क्षेत्र में पानी 5 से 10 मीटर पर था। आज वही पानी 30 से 40 मीटर पर है। यानी हर साल औसतन 70 सेंटीमीटर की गिरावट हुई है। बोर्ड की भूजल संसाधन-2025 रिपोर्ट में फतेहगढ़ साहिब में दोहन का स्तर 182.13 प्रतिशत दर्ज हुआ है, जबकि पंजाब का औसत 156 प्रतिशत है। इसका अर्थ है कि जितना पानी प्रकृति भरती है, उससे लगभग दोगुना निकाला जा रहा है।

यह गिरावट भविष्य की चेतावनी भी है। सीजीडब्ल्यूबी के दीर्घकालिक मॉडल के अनुसार यदि दोहन 156 प्रतिशत से नीचे नहीं लाया गया तो मालवा क्षेत्र के लगभग 16,600 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में 2030 तक जल स्तर 40 मीटर से भी नीचे चला जाएगा। फतेहगढ़ साहिब मालवा बेल्ट के इसी क्षेत्र में आता है। बोर्ड के वैज्ञानिकों ने रिपोर्ट में स्पष्ट चेतावनी दी है कि पंजाब के 82 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र में गिरावट की यह दर मरुस्थलीकरण की ओर ले जा सकती है।

पानी नीचे ही नहीं, खराब भी हो रहा है

संकट सिर्फ मात्रा का नहीं, गुणवत्ता का भी है। सीजीडब्ल्यूबी की वार्षिक गुणवत्ता रिपोर्ट 2024 के अनुसार पंजाब के 32.6 प्रतिशत सैंपल में यूरेनियम और 4.85 प्रतिशत में आर्सेनिक तय सीमा से अधिक मिला है। फतेहगढ़ साहिब के लिए यह खतरा दोगुना है। मंडी गोबिंदगढ़ औद्योगिक बेल्ट के नजदीक होने के कारण यहां भारी धातुओं के रिसाव का खतरा अधिक है। जैसे-जैसे पानी नीचे जाएगा, खारापन और यूरेनियम का स्तर बढ़ेगा, जो सीधे पीने के पानी और सेहत पर असर डालेगा।

फतेहगढ़ साहिब का जल-संकट

साल- औसत- जल स्तर- भूजल दोहन

2005 8-10 मीटर लगभग 90%
2015 22-25 मीटर लगभग 150%
2025 35-40 मीटर 182.13%

सरहिंद में सुधार क्यों?

फतेहगढ़ साहिब के सरहिंद ब्लॉक में भूजल दोहन में सुधार दर्ज हुआ है। यह सुधार जल स्तर के 10 मीटर बढ़ने जैसा नहीं, बल्कि दोहन प्रतिशत में 10 प्रतिशत की कमी है। यानी पहले जहां 190 प्रतिशत दोहन था, वह घटकर लगभग 170 प्रतिशत पर आया है।

यह सुधार नहरी पानी का इस्तेमाल बढ़ने से हुआ है। केंद्र और राज्य की संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार सरहिंद ब्लॉक नरवाणा ब्रांच नहर के कमांड क्षेत्र में आता है। किसानों ने ट्यूबवेल की बजाय नहरी पानी अधिक इस्तेमाल किया, जिससे जमीन से पानी निकालना कम हुआ और नहरों के रिसाव से जमीन में पानी भरना शुरू हुआ है। यह बदलाव दिखाता है कि यदि नहरी पानी हर खेत तक पहुंचे तो भूजल संकट को रोका जा सकता है।