जागरण संवाददाता, फरीदकोट

स्थानीय श्री राधा कृष्ण धाम में आचार्य श्रीकान्त त्रिपाठी और शीघ्रता त्रिपाठी के सानिध्य में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के सातवें और अंतिम दिन की कथा आरंभ करते हुए दीदी जी ने कृष्ण सुदामा मिलन का प्रसंग सुनाया। इससे श्रोता भाव विभोर हो गए और आंखें नम हो गए। दीदी ने बताया कि सुदामा गरीब नहीं थे। उनके पास भक्ति थी। श्रीकृष्ण नाम ही उनका आश्रय था। सुदामा ने श्रीकृष्ण के पास जाकर भी कुछ नहीं मांगा। मगर श्रीकृष्ण ने सुदामा के घर पहुंचने से पहले ही सब कुछ पहुंचा दिया था। इस कहानी से हमे यह शिक्षा मिलती है कि तमाम मित्र केवल हमारे सुख के ही साथी होते हैं। दुख के समय यह सब हमारा साथ छोड़ देते हैं। जो विपरीत समय में हमारी सहायता करता है ऐसा मित्र ही हमारा सच्चा मित्र होता है। मित्रता की परीक्षा आपत्ति के समय में ही होती है। धीरज और धर्म की परीक्षा भी आपत्ति में ही होती है। सुनते आ रहे हैं कि सुदामा गरीब है, लेकिन सुदामा जी गरीब नहीं हैं। गरीब तो वह करोड़पति भी हो सकता है, जिसके पास संतोष नहीं। जिसके पास संतोष है वही सबसे बड़ा धनवान है।

जो लोग पिछले 6 दिनों से भागवत कथा सुनने नहीं भी आ सके उन्हें मात्र कृष्ण सुदामा चरित्र का प्रसंग सुनने से पूरी भागवत कथा का फल मिल चुका है। कृष्ण और सुदामा जैसी मित्रता आज कहां है। यही कारण है कि आज भी सच्ची मित्रता के लिए कृष्ण सुदामा की मित्रता का उदाहरण दिया जाता है। आज की संपूर्ण कथा का सार यह निकला कि देने से कोई चीज कभी घटती नहीं। लेने वाले से देने वाला बड़ा होता है। अंधेरे में छाया बुढ़ापे में काया और अन्त समय में माया किसी का साथ नहीं देती। भगवान कृष्ण भक्त वत्सल हैं. वह सबके दिलों में विहार करते हैं. मनुष्य स्वयं भगवान बनने के बजाय प्रभु का दास बनने का प्रयास करें। भक्ति भाव देख जब प्रभु का वात्सल्य जगता है, तो वह सबकुछ छोड़कर भक्त रूपी संतान के पास दौड़े चले आते हैं। आज कृष्ण, रुक्मणि और सुदामा चरित्र का वर्णन झांकी के माध्यम से प्रस्तुत किया, जिससे मंत्रमुग्ध होकर कथा पंडाल में मौजूद भक्तगण जय श्री राधे , राधे- राधे के जयकारे करने लगे। शुक्रवार को हवन यज्ञ और भंडारे के साथ कथा का समापन किया गया।

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