चंडीगढ़ [इन्द्रप्रीत सिंह]। पानी... पंजाब ही नहीं अब तो देश का सबसे बड़ा मुद्दा बन चुका है। पाकिस्तान को जाने वाले पानी को रोकने के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि पानी का यह मुद्दा केवल चुनावी सीजन में उठता है और चुनावी नहरें चुनाव रण को सींचने के बाद सूख जाती हैं। इसके बाद अगले चुनाव तक इस मुद्दे की ओर कोई झांकता तक नहीं है।

पंजाब में बहने वाली चुनावी नहरों में SYL प्रमुख है। पंजाब में पानी के संकट को लेकर राजनीतिक पार्टियां चुनाव समय इस पर आवाज उठाती रही हैं, लेकिन चुनाव के बाद इस मुद्दे पर बात ही नहीं की जाती। 2017 के विधानसभा चुनाव के दौरान SYL नहर ज्वलंत मुद्दा रही। कुछ समय पहले पाकिस्तान के साथ संबंध बिगड़े तो कहा गया कि भारत पाकिस्तान को जाने वाला पानी रोक देगा और पाकिस्तान बूंद-बूंद को तरसेगा, लेकिन पानी रोका कैसे जाएगा और इसके लिए क्या कदम उठाए जाएंगे इसे लेकर आज तक रूपरेखा नहीं बन सकी।

SYL पंजाब-हरियाणा की चुनावी नहर

पानी को लेकर जहां भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद गहराता दिख रहा है, वहीं पंजाब का पड़ोसी राज्यों के साथ भी पानी को लेकर विवाद किसी से छुपा नहीं है। इस विवाद को लेकर इन राज्यों की सरकारों ने अदालतों की शरण ली हुई है और केस लडऩे के लिए करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाया जा रहा है। हर राज्य कह रहा है कि उसके पास किसी को देने के लिए फालतू पानी नहीं है। वहीं इन राज्यों की पानी को लेकर जरुरतें लगातार बढ़ती जा रही हैं।

पंजाब में मौजूदा समय के दौरान 29 लाख हेक्टेयर रकबे में धान की खेती की जा रही है। जिसे सींचने के लिए नहरी पानी के अलावा भूजल का का सहारा रहा है। वहीं, हरियाणा का भी दावा है कि उसके पास पानी की कमी है। हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर पिछले दिनों हरियाणा में प्रति व्यक्ति 150 लीटर पानी देने का दावा कर चुके हैं, लेकिन वह भी यह नहीं बता पाए कि पानी कहां से लाया जाएगा। SYL नहर से हरियाणा को 1.2 क्यूसिक पानी दिया जा रहा है।

वाटर पॉलिसी भी चढ़ी वोट बैंक की भेंट

पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने गिर रहे भूजल स्तर को देखते हुए वाटर पॉलिसी बनाने की ओर कदम जरूर बढ़ाए थे, लेकिन वह भी वोट की राजनीति की भेंट भेंट चढ़ गई है। निश्चित रूप से पानी बचाने के लिए चुनाव में कोई बात नहीं होगी, लेकिन चुनावी नहरों पर सभी का फोकस जरूर रहेगा जो केवल चुनाव के समय में ही बहती हैं। 

सतलुज और ब्यास नदियों पर भाखड़ा व पौंग डैम बनाकर रोका गया पानी

बता दें कि भारत पाक विभाजन के समय छह नदियों का बंटवारा हुआ। भारत के हिस्से सतलुज, रावी और ब्यास नदियां आईं तो पाकिस्तान के हिस्से सिंधु, झेलम और चिनाब। सतलुज और ब्यास पर भाखड़ा व पौंग डैम और नीचे बैराज बनाकर भारत ने पानी रोका लिया, जिसे निश्चित नहरी सिस्टम के जरिए एक से दूसरे राज्यों में भेजा जा रहा है। हालांकि, ये दोनों नदियां हरिके पत्तन के पास एक ही होकर पाकिस्तान की सीमा में चली जाती हैं। पाकिस्तान में केवल बरसाती पानी और हरिके पत्तन पर होने वाली लीकेज का पानी ही जाता है।

डैम बनाया, लेकिन बैराज के बिना सही काम नहीं आया

रावी नदी पर रंजीत सागर डैम बनाया गया है, लेकिन उसके नीचे शाहपुर कंडी बैराज नहीं बनाया गया। जो भी पानी रंजीत सागर बांध से बिजली बनाने के बाद छोड़ा जाता है, वह रावी में चला जाता है। क्योंकि इस पानी को संभालने के लिए बनाए गए माधोपुर हेडवर्क्स में इतनी क्षमता नहीं है कि वह इसे संभाल जा सके। इसलिए या तो भारत को रंजीत सागर बांध आधी क्षमता पर चलाना पड़ता है या फिर पानी को रावी में छोडऩा पड़ता है।

पिछले 22 साल से इस बात के सिर्फ दावे हो रहे हैं कि रंजीत सागर बांध के नीचे शाहपुर कंडी डैम बनाया जाएगा। जो डैम 22 साल पहले मात्र 1200 करोड़ रुपये में बन जाना था आज इसकी कॉस्ट 3600 करोड़ रुपये को पार कर गई है। अब शाहपुर कंडी के अलावा मकौड़ा पत्तन पर एक और डैम बनाकर रावी और उज्ज दरिया के 2000 क्यूसिक पानी को बचाने की बातें हो रही हैं, लेकिन अभी तक इस मामले में पर कोई गंभीर प्रयास होते दिखाई नहीं दे रहे। सवाल बरकरार है कि यह घोषणाएं आने वाले संसदीय चुनाव को देखते की गईं या वाकई इस पर काम होगा।

क्या कहते हैं सियासी दल

पानी को लेकर यदि राजनीतिज्ञों से बात की जाए तो सभी पॉलिटिकल पार्टियां पानी को बचाने, उसे संभालने, रिचार्ज करने आदि की नीतियों पर एकमत हैं, लेकिन दिलचस्प बात यह है कि जब भी इस पर नीति बनाने की बात आती है, तो सभी को अपना-अपना वोट बैक नजर आने लगता है।

इजरायल सरकार के साथ किया एमओयू: कैप्टन

मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह का मानना है कि पंजाब में अब पानी सबसे बड़ा मुद्दा बनकर उभर रहा है। चाहे वह भूजल हो या फिर सरफेस वाटर। उन्होंने बताया कि वह खुद पानी की मैनेजमेंट का अध्ययन करने के लिए इजरायल जाकर आए हैं और उनकी कार्पोरेशन के साथ एमओयू भी साइन किया है। हमारी सरकार, जल संबंधी संकट को अच्छे तरीके से समझ रही है। इसलिए वाटर पॉलिसी बनाई गई है। हालांकि, यह अभी लागू नहीं हुई है।

कैप्टन का कहना है कि हमारे संबंधित विभागों के मंत्रियों की टीम भी इजरायल जा रही है। अपने पिछले कार्यकाल में भी गेहूं और धान के फसली चक्र से किसानों को निकालने के लिए फसली विविधता का प्रोग्राम बनाया था, लेकिन मेरा मानना है कि यह भारत सरकार के सहयोग के बिना संभव नहीं है। इसके अलावा अभी हमने ट्यूबवेलों के लिए दी जाने वाली सब्सिडी सीधे किसानों के खाते में डालने का एक पायलट प्रोजेक्ट भी चलाया है, ताकि किसान कम पानी के लागत वाली फसलों को उगा सकें।

पानी बचाने के लिए 3300 करोड़ रुपये का प्लान बनाया: सुखबीर

शिरोमणि अकाली दल के प्रधान सुखबीर बादल का कहना है कि उनकी सरकार ने जहां अपने हिस्से के पानी को बचाने के लिए पूरा जोर लगाया। SYL नहर के लिए अधिगृहीत जमीन को डी-नोटिफाई करने जैसे कदम उठाए। वहीं नहरी पानी को ज्यादा से ज्यादा प्रयोग में लाया जाए। इसके लिए 3300 करोड़ रुपये का प्लान बनाया था, ताकि जमीनी पानी पर निर्भरता कम की जा सके। हमारी सरकार ने नहरों में रासायनिक पानी न गिरे इसके लिए ट्रीटमेंट प्लांट लगाने की भी योजनाएं चलाईं। भूजल को बचाने के लिए हमारी ही सरकार ने धान की रोपाई को दस जून से शुरू करने का एक्ट पास किया।

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Posted By: Kamlesh Bhatt

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