प्रशासक के दिमाग में आया ऐसा आइडिया, जो बनेगा चंडीगढ़ में पर्यटन का बड़ा आधार, सुखना जंगल को लेकर कही ये बात
पंजाब के राज्यपाल और चंडीगढ़ के प्रशासक गुलाब चंद कटारिया ने कहा कि सुखना लेक के पीछे का वन क्षेत्र ...और पढ़ें

चंडीगढ़ के प्रशासक गुलाब चंद कटारिया।
HighLights
सुखना लेक का जंगल पर्यटन का बड़ा आधार बन सकता है।
विकास और पर्यावरण संरक्षण में संतुलन बनाना आवश्यक है।
वेटलैंड के वैज्ञानिक प्रबंधन और जैव विविधता संरक्षण पर जोर।
राजेश ढल्ल, चंडीगढ़। पंजाब के राज्यपाल एवं चंडीगढ़ के प्रशासक गुलाब चंद कटारिया ने कहा कि सुखना लेक केवल चंडीगढ़ की खूबसूरती और पहचान नहीं है, बल्कि इसके पीछे विकसित वन क्षेत्र भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यह पूरा इलाका वन्यजीव और जैव विविधता के संरक्षण के साथ-साथ चंडीगढ़ और पंजाब के लिए पर्यटन का बड़ा आधार बन सकता है।
उन्होंने कहा कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच ऐसा संतुलन बनाना होगा, जिसमें प्रकृति भी सुरक्षित रहे और आसपास रहने वाले लोगों की मूलभूत जरूरतें भी पूरी हो सकें।
जैव विविधता पर आयोजित राष्ट्रीय बैठक में कटारिया ने सुखना लेक का उदाहरण देते हुए कहा कि प्रशासन ने हमेशा कोशिश की है कि झील में आने वाला पानी प्रदूषित न हो। लेकिन झील बनने से पहले से ही आसपास आबादी बसी हुई है।
ऐसे में इन गांवों के ड्रेनेज की व्यवस्था करना भी जरूरी है। कई बार ड्रेनेज पाइपलाइन बिछाने के लिए वन क्षेत्र से जमीन की जरूरत पड़ती है और इसी कारण व्यावहारिक दिक्कतें सामने आती हैं।
उन्होंने कहा कि आबादी को हटाया नहीं जा सकता। यदि गांव का पानी बाहर निकालने की व्यवस्था नहीं होगी तो समस्या और गंभीर होगी। इसलिए ऐसे मामलों में विभागों को मिलकर समाधान निकालना चाहिए। जहां वन भूमि की जरूरत हो, वहां वैकल्पिक जमीन, प्रतिपूरक पौधरोपण और अन्य पर्यावरणीय उपायों के जरिए रास्ता निकाला जा सकता है।
कटारिया ने कहा कि सुखना लेक के पीछे का जंगल आज वन्यजीवों के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र बन चुका है। उन्होंने कहा कि झील की सुंदरता के साथ यदि इस पूरे वन क्षेत्र को भी विकसित किया जाए तो चंडीगढ़ पर्यटन के क्षेत्र में और आगे बढ़ सकता है।
उन्होंने हरिके, कंजली, रोपड़, नंगल और अन्य आर्द्रभूमियों का उल्लेख करते हुए कहा कि पंजाब और चंडीगढ़ में वेटलैंड आधारित पर्यटन की बड़ी संभावनाएं हैं। सुखना वेटलैंड के संरक्षण को लेकर प्रशासन पहले से कई कदम उठा रहा है।
जुलाई में हुई वेटलैंड अथॉरिटी की बैठक में भी कटारिया ने झील के वैज्ञानिक प्रबंधन, जैव विविधता संरक्षण और प्रवासी पक्षियों के लिए बेहतर आवास विकसित करने पर जोर दिया था। वैज्ञानिक डी-सिल्टिंग से झील की जलधारण क्षमता में करीब 5.4 हेक्टेयर-मीटर की वृद्धि की उम्मीद जताई गई है।
उन्होंने कहा कि प्रकृति संरक्षण के साथ-साथ स्थानीय आबादी की समस्याओं को भी समझना होगा। गांवों की पुरानी सड़कें, स्कूल, अस्पताल, ड्रेनेज और अन्य आवश्यक सुविधाएं केवल इसलिए नहीं रुकनी चाहिए कि वे वन क्षेत्र के आसपास हैं। जरूरत इस बात की है कि ऐसी परियोजनाओं के लिए वैकल्पिक जमीन और पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति का स्पष्ट रास्ता तय हो।
कटारिया ने कहा कि सुखना लेक और इसके पीछे का जंगल मिलकर चंडीगढ़ की प्राकृतिक विरासत हैं। इनका संरक्षण केवल सरकारी विभागों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पर्यटन, जैव विविधता और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा विषय है।
