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माता सीता का किरदार निभाने दुबई से मोहाली लौटी शिवानी हंस, विदेश में रहकर भी नहीं टूटा रामलीला से नाता

Published: Sat, 17 Oct 2026 07:17 PM (IST)

दुबई में पेशेवर जीवन के बावजूद, शिवानी हंस अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी हुई हैं। वह हर साल रामलीला में ...और पढ़ें

शिवानी हंस का कॉलेज के दिनों से रामलीला से जुड़ाव।

शिवानी हंस का कॉलेज के दिनों से रामलीला से जुड़ाव।

HighLights

  1. दुबई में रहकर भी रामलीला से जुड़ाव बरकरार।

  2. माता सीता की भूमिका निभाने मोहाली लौटीं शिवानी।

  3. सांस्कृतिक विरासत के प्रति उनका गहरा समर्पण।

जागरण संवाददाता, मोहाली। करियर और बेहतर भविष्य के लिए विदेश जाने वाले लोगों के बीच मोहाली की शिवानी हंस अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुड़े रहने की मिसाल हैं। पेशेवर जीवन के सिलसिले में दुबई में रह रहीं शिवानी रामलीला के मंच पर माता सीता की भूमिका निभाने के लिए मोहाली लौटी हैं।

शिवानी का रामलीला से जुड़ाव 2017 में काॅलेज में पढ़ाई के दौरान शुरू हुआ। उस समय मोहाली के फेज-1 स्थित श्री रामलीला एवं दशहरा कमेटी ने पहली बार महिला कलाकारों को मंच पर अभिनय का अवसर दिया। शिवानी भी इस पहल का हिस्सा बनीं।

शुरुआत में उन्होंने कैकेयी और शूर्पणखा की भूमिकाएं निभाईं। 2019 में उन्हें माता सीता का किरदार निभाने का अवसर मिला। तब से यह भूमिका उनके रामलीला सफर का अहम हिस्सा बनी हुई है।

दुबई जाने से पहले निभाई जिम्मेदारी

2025 में पेशेवर कार्यों के लिए शिवानी को दुबई जाना था। उनका विदेश जाने का कार्यक्रम नवरात्र और रामलीला के आयोजन के समय से टकरा रहा था। उन्होंने पहले रामलीला में माता सीता की भूमिका निभाई और फिर दुबई रवाना हुईं।

विदेश में रहने के बाद भी शिवानी रामलीला के दिनों में भारत आती हैं। मंच पर माता सीता का किरदार निभाने के बाद वह वापस दुबई लौट जाती हैं। पत्रकारिता के पेशे और विदेश में जीवन की जिम्मेदारियों के बीच समय निकालना उनके समर्पण को दर्शाता है।

जीवन के मूल्यों को समझने का माध्यम

शिवानी के लिए माता सीता की भूमिका केवल अभिनय नहीं, बल्कि जीवन के मूल्यों को समझने और अपनाने का माध्यम है। उनके अनुसार, माता सीता का चरित्र धैर्य, आत्मसम्मान, मर्यादा और आदर्शों की सीख देता है। वह हर साल यह भूमिका श्रद्धा और जिम्मेदारी के साथ निभाती हैं।

शिवानी का सफर बताता है कि दुनिया के किसी भी कोने में रहने के बावजूद अपनी सांस्कृतिक पहचान संजोकर रखी जा सकती है। दुबई उनकी कर्मभूमि है, लेकिन रामलीला का मंच आज भी उनकी आस्था और परंपराओं से जुड़ा खास स्थान रखता है।